करताल प्रधानमंत्री मोदी जनकपुर में बजा रहे थे, मगर उसकी अनुगूंज सिर्फ अयोध्या, काशी, प्रयाग और चित्रकूट ही नहीं बल्कि भक्ति परंपरा के वैष्णव संत रामानुजाचार्य की कर्मभूमि कर्नाटक और तमिलनाडु तक पहुंची होगी। पूजा प्रधानमंत्री मोदी जनकपुर में कर रहे थे लेकिन अयोध्या का मंदिर और मस्जिद का मसला भारतीय मीडिया में फिर से निकल पड़ा था। प्रधानमंत्री मोदी का दूसरा तीर्थ मुक्तिनाथ था। जिसे वैष्णव का ही स्वामीनारायण सम्प्रदाय का महत्वपूर्ण धाम माना जाता है। धाम की भूमि मात्र भी पवित्र मानी जाती है। वहां पहुंचना ही अपने आप में एक उपलब्धि है। मुक्तिनाथ से प्रधानमंत्री की नजर गुजरात पर होगी जहां स्वामीनारायण सम्प्रदाय का उल्लेख है।
रामायण सर्किट से फूंका चुनावी बिगुल
पशुपतिनाथ में बतौर प्रधानमंत्री मोदी ने तीसरी बार पूजा-अर्चना की। निगाहें थी शैव सम्प्रदाय पर जो पूरे भारत में फैले हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी काशी से सांसद हैं। तीर्थस्थलों में पशुपतिनाथ और काशी विश्वनाथ की महत्ता को बार-बार दोहराना उनकी आदत सी हो गई हैं। हरि भजन भले ही प्रधान तीर्थयात्री का मकसद रहा हो, लेकिन भारतीय जनता पार्टी का प्रमुख चेहरा अपने राजनीतिक प्रचारक की भूमिका को वे भूले नहीं।
भारत में आम चुनाव अगले साल होने हैं। नेपाल से सटा उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल नई दिल्ली के शासक का भाग्य निर्धारण करेगा। सो एक साथ प्रधानमंत्री मोदी ने रामायण सर्किट, बोधगया, अयोध्या-जनकपुर बस सेवा और पर्यटन विकास की बात कर डाली और हिन्दी में मैथिली और नेपाली का भाषाओं का गुणगान भी किया। लगता है भाजपा अपने प्रचार तंत्र को 2019 के चुनावों के मद्देनजर चुस्त दुरुस्त करने में लग गई है।
जनकपुर के बारहबीघा मैदान में प्रधानमंत्री मोदी जब बोल रहे थे तो लग रहा था कि वो किसी चुनाव प्रचार सभा को संबोधित कर रहे हों। अंग्रेजी भाषा के ऐक्रोनिम्स के साथ प्रधानमंत्री मोदी का लगाव बना हुआ है। पिछली बार उन्होंने नेपाल के सांसदों को 'हिट', यानी 'हाईवेज, आई-वेज और ट्रांसवेज' के नारे के साथ संबोधित किया था।
इस बार जनसमुदाय के हाथ में 'फाईव टी' का झुनझुना पकड़ा गए।
परम्परा, प्रबन्ध और व्यापार, पर्यटन, प्रविधि और परिवहन को 'पांच प' भी कहा जा सकता था मगर अंग्रेजी के तुक्कों का मजा ही कुछ और है। तमाशेबाजी की डिप्लोमेटिक ऑप्टिक्स अपनी जगह, नेपाल-भारत सम्बन्ध के विवादग्रस्त कूटनीतिक और आर्थिक मुद्दे ज्यों के त्यों हैं। अपने सार्वजनिक संबोधनों में प्रधानमंत्री मोदी 'मधेश' शब्द उच्चारण करने से कन्नी काटते रहे।
2015 में संविधान संशोधन के लिए 50 से ज्यादा मधेशियों ने जान दी थी। उनकी कुर्बानी का जिक्र तक ना हुआ। हां, आंसू पोंछने के लिए सौ करोड़ रुपये के सहयोग का वादा जरूर प्रधानमंत्री मोदी कर गए। दशकों से मधेश की जीवनरेखा माने जाने वाली भारतीय सहयोग के हुलाकी राजमार्ग की सुस्त गति देखते हुए नई दिल्ली के वायदों पर नेपालियों का भरोसा परिणाम के बाद ही पुख्ता होगा।
नेपाल के हुक्मरानों को रिझाने की अपीजमेंट पॉलिसी की भी अपनी सीमाएं हैं। चीन के सामरिक सरोकार को काठमांडू अनदेखा नहीं कर सकता है। शीतयुद्ध के समय से ही नेपाल अमेरिका के साथ-साथ अन्य पश्चिमी देशों की कूटनीतिक का खेल मैदान रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के चाहने भर से काठमांडू का भारत के प्रति रवैया रातोंरात बदल नहीं सकता है। भारतीय जनमानस में भले ही 'मोदी नॉट वेलकम' सोशल नेटवर्क के प्रवाह से एकाएक गायब हो गया हो, मगर नेपाल के मध्यम वर्ग में वर्षों से व्याप्त भारत विरोधी जनभावना प्रधानमंत्री मोदी के भजन गाने भर से मिटने वाली नहीं है।
प्रधानमंत्री मोदी की नेपाल यात्रा का उदेश्य हिन्दुत्व की राजनीति को कूटनीतिक रंग देना था जो कि उन्होंने भलिभांति किया। संविधान संशोधन के मुद्दे को ठंडे बस्ते में रखकर काठमांडू के साथ मिलकर काम करने की सलाह वो मधेशियों को देना चाहते थे। इस कार्य में उन्हें सिर्फ आंशिक सफलता मिली।
जनकपुर के नागरिक अभिनन्दन समारोह में भी स्वतन्त्र मधेस के नारे लगे और मंच पर से मधेशियों के संघर्ष के इतिहास को याद किया गया। प्रधानमंत्री मोदी की अपीजमेंट की कूटनीति की उपलब्धि तो तब देखी जाएगी जब नेपाल के प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली अपने प्रस्तावित बीजिंग यात्रा पर कुछ दिनों बाद निकलेंगे। प्रधानमंत्री मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री ओली की कूटनीतिक ऑप्टिक्स से चकाचौंध करने की क्षमता अगर इक्कीस ना हो तो उन्नीस भी नहीं है।
प्रधानमंत्री मोदी करतल बजाते दिखाई दिए तो उनको प्रभावित करने के लिए पूर्व नक्सलपंथी प्रधानमंत्री ओली ने गेरुआ वस्त्र धारण किया। और कुछ हो न हो, कूटनीतिक तमाशेबाजी दर्शकों को मनोरंजन भरपूर देती है। अब भगवान बुद्ध की जन्मभूमि लुम्बिनी को प्रधानमंत्री मोदी के चौथे नेपाल तीर्थयात्रा की प्रतीक्षा रहेगी जिसका जिक्र अपने संभाषणों में करना वो कभी नहीं भूलते। जहां तक आम लोगों के रोटी, बेटी और रोजीरोटी के सम्बन्धों का सवाल है, वह तो सदियों से चलता आ रहा है और चलता ही रहेगा।