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मालदीव में गहराया राजनीतिक संकट, पूर्व राष्ट्रपति सहित जजों की गिरफ्तारी के आदेश जारी

Tue, 06 Feb 2018 06:31 PM IST
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
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अब्दुल्ला यामीन
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पिछले कुछ दिनों से चला आ रहा मालदीव संकट और गहरा गया है। राष्ट्रपति यामीन अब्दुल्ला गयूम ने देश में इमरजेंसी की घोषणा करते हुए पूर्व राष्ट्रपति सहित देश के टॉप जजों को गिरफ्तार करने का निर्देश जारी कर दिया है।   
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जिस तरह से मालदीव में अचानक राजनीतिक हलचल पैदा हुई थी और सेना जिस तरह से राष्ट्रपति गयूम का साथ दे रही थी, उससे यह लगने लगा था कि कहीं विपक्षी नेताओं की रिहाई का आदेश देने वाले सर्वोच्च अदालत के जजों को ही न गिरफ्तार कर लिया जाए,और मंगलवार को यह हो भी गया। यामीन 2013 में सत्ता में आए और जेल आते ही उन्होंने विपक्षी पार्टी के करीब करीब हर नेता को जेल की हवा खिला दी। 

महासागर में स्थित द्वीपीय देश मालदीव के राष्ट्रपति यामीन अब्दुल्ला गयूम की सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद सहित दूसरे विपक्षी नेताओं की रिहाई और 12 सांसदों की बहाली के आदेश की अनदेखी कर रही थी, जिससे वहां राजनीतिक संकट गहराता जा रहा था। 
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हालत यहां तक उत्पन्न हो गए थे कि मालदीव की सेना राष्ट्रपति का समर्थन कर रही है, जिससे अदालती आदेश पर अमल करना मुश्किल हो गया था। 
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दरअसल, गयूम खुद चौतरफा संकट में घिरते जा रहे थे और वह किसी भी तरह से सत्ता में बने रहने के लिए देश में इमरजेंसी घोषित कर सकते थे। जिससे उनकी कुर्सी सलामत बनी रहे। 
बता दें कि यहां इसी साल अक्तूबर में चुनाव होने हैं, और अदालती आदेश से नाशीद के चुनाव लड़ने का रास्ता साफ हो गया है और उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव लड़ने का एलान भी कर दिया है।

 यदि वहां की संसद के स्पीकर 12 सांसदों की बहाली कर देते, तो 85 सदस्यीय संसद में गयूम की सरकार अल्पमत में आ जाती और विपक्ष की सरकार बन सकती थी। ऐसी स्थिति में विपक्ष गयूम के खिलाफ महाभियोग लाकर उन्हें हटाने की कवायद शुरू कर सकती थी।

 दूसरी ओर सेना जिस तरह से गयूम का साथ दे रही है, उससे इस बात की आशंका भी बढ़ रही थी कि कहीं सर्वोच्च अदालत के जजों को ही न गिरफ्तार कर लिया जाए।  इस मामले को संजीदगी से लेते हुए संयुक्त राष्ट्र तक ने कहा है कि वहां की सरकार संविधान और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की अनदेखी कर रही है। 

खुद नाशीद पहले से ब्रिटेन में हैं और भारत सहित पश्चिमी देशों में उनकी पैठ है, जिसकी वजह से गयूम सरकार पर अंतरराष्ट्रीय दबाव है कि वह अदालती फैसले को मानें। मालदीव का सिर्फ यही संकट नहीं है, इस देश का नाम इस्लामिक स्टेट के एक केंद्र के रूप में भी सामने आया है। 

चार लाख की आबादी वाले इस देश से दो सौ लोगों के इराक और सीरिया जाकर इस्लामिक स्टेट में शामिल होने की खबरें आ चुकी हैं। मगर इन सबसे बड़ी बात यह है कि लंबी तानाशाही झेल चुके इस देश में लोकतंत्र के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है। 

पिछले कुछ वर्षों में चीन ने वहां जिस तरह से निवेश किया है, उससे मालदीव के साथ हमारे रिश्ते सहज नहीं हैं। प्रधानमंत्री मोदी की 2015 की प्रस्तावित यात्रा के टलने के बाद उनका दोबारा कार्यक्रम नहीं बन सका है। भारत की नजर वहां के घटनाक्रम पर है, लेकिन स्थिति बिगड़ने से पहले उसे वहां जरूरी हस्तक्षेप से नहीं हिचकना चाहिए।
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