इस हफ्ते छपने वाले उर्दू अखबारों की बात की जाए तो भारत-पाक के रिश्ते और ट्रिपल तलाक से जुडी खबरें सुर्खियों में बनी रहीं। पहले बात पाकिस्तान से छपने वाले अखबारों की। 'जंग' लिखता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध को बेहतर बनाने के लिए चीन अपना रोल अदा करने को तैयार है। चीन के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता के हवाले से अखबार लिखता है कि चीन हर हालत में पाकिस्तान का साथ देगा।
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अखबार लिखता है कि दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन सही नहीं है और सी-पैक (चीन और पाकिस्तान) इसे बेहतर करेगा। अखबार ये भी लिखता है कि भारत का सीमा को पूरी तरह सील करने का फैसला भी सही नहीं है।
'रोजनामा दुनिया' लिखता है कि भारत प्रशासित कश्मीर में कश्मीरियों की 'आजादी की लडाई' का समर्थन करने से दुनिया की कोई ताकत पाकिस्तान को नहीं रोक सकती है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के हवाले से अखबार लिखता है कि कश्मीरियों की जायज लडाई को दहशतगर्दी से जोडना भारत की गलती है।
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''लोकतंत्र के नाम पर मजाक हो रहा है''
पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश अनवर जहीर जमाली
- फोटो : BBC
पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश अनवर जहीर जमाली का एक बयान भी सारे अखबारों के पहले पन्ने पर रहा। मुख्य न्यायाधीश ने एक केस की सुनवाई के दौरान कहा था कि पाकिस्तान में लोकतंत्र के नाम पर राजतंत्र है, और इसके खिलाफ आम जनता को खडा होना चाहिए।
'दुनिया' ने सुर्खी लगाई है, ''लोकतंत्र के नाम पर मजाक हो रहा है : मुख्य न्यायाधीश'' पाकिस्तान के अखबार डॉन में छपी एक खबर भी इस हफ्ते दूसरे अखबारों में सुर्खियां बटोरती रही। दरअसल प्रधानमंत्री निवास पर होने वाली एक बैठक के बारे में डॉन अखबार ने छह अक्तूबर को पहले पन्ने पर खबर प्रकाशित की, जिसमें सूत्रों के हवाले से कहा गया था कि सरकार ने सैन्य नेतृत्व को आतंकवाद के कथित समर्थन के कारण पाकिस्तान के अलग-थलग पड़ जाने की बात कही थी।
सरकार ने इसे मनगढंत करार दिया था लेकिन अखबार ने कहा था कि वो अपनी खबर पर कायम है। इसके बाद डॉन के रिपोर्टर सिरिल अलमेइडा (जिसने ये खबर लिखी थी) को सरकार ने एक्जिट कंट्रोल लिस्ट में डाल दिया था। इसके तहत उनके पाकिस्तान से बाहर जाने पर रोक लगा दी गई।
सिरिल अलमेइडा का नाम ईसीएल से निकाल दिया गया
मुस्लिम महिलाएं
- फोटो : BBC
इस बारे में रोजनामा एक्सप्रेस ने लिखा है, ''मनगढ़ंत खबर फीड किया जाना देश की सुरक्षा के लिए खतरा है।'' वहीं रोजनामा दुनिया ने लिखा है, ''गलत खबर से दुश्मन ने फायदा उठाया।"
अखबार ने पाकिस्तान को गृह मंत्री चौधरी निसार अली के हवाले से लिखा है कि ऐसी गलत खबर लीक करने वालों को कानून की गिरफ्त में लाया जाएगा। बाद में सिरिल अलमेइडा का नाम ईसीएल से निकाल दिया गया।
इस पर रोजनामा एक्सप्रेस लिखता है कि गृहमंत्री ने पत्रकार सिरिल अलमेइडा का नाम ईसीएल से निकाल दिया है और गृहमंत्री ने उम्मीद जताई है कि अलमेइडा जांच में सहयोग करेंगे। रुख भारत का करें तो वहां से छपने वाले उर्दू अखबारों में यूनिफॉर्म सिविल कोड से संबंधित लॉ कमीशन के सवालनामे की खबरें हफ्ते भर सुर्खियों में रही हैं।
लॉ कमीशन ने इस बारे में 16 प्रश्नों की प्रश्नावली को सात अक्तूबर को अपनी वेबसाइट पर डाला है और लोगों से 45 दिनों के अंदर उन पर जवाब मांगा है।
मुसलमानों की धार्मिक संस्था मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसका विरोध करते हैं
पाकिस्तान
- फोटो : BBC
मुसलमानों की धार्मिक संस्था मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसका विरोध करते हुए इसका बहिष्कार किया है और मुसलमानों से अपील की है कि वो लॉ कमीशन के सवालों के जवाब न दें। जदीद खबर ने लिखा है, ''यूनिफॉर्म सिविल कोड के खिलाफ मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का एलान-ए-जंग'' इंकलाब ने संपादकीय लिखा है।
''यूसीसी से संबंधित सवालनामा एकतरफा, साफ मालूम होता है कि नीयत क्या है!'' अखबार लिखता है कि सवालों को इस तरह से चुना गया है कि उनका झुकाव जनता की राय जानने से ज्यादा यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की तरफ है।
अखबार आगे लिखता है कि यही कारण है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और मुसलमानों की दूसरे संगठनों ने लॉ कमीशन के सवालनामे को पक्षपातपूर्ण करार देते हुए उसके बहिष्कार का फैसला किया है।
रोजनामा राष्ट्रीय सहारा ने लिखा है, ''तीन तलाक पर सरकार से तकरार जारी'' वहीं हिंदुस्तान एक्सप्रेस ने केंद्रीय सूचना एंव प्रसारण मंत्री वैंकैया नायडू के बयान को सुर्खी बनाते हुए लिखा है, ''तीन तलाक के मसले को यूनिफॉर्म सिविल कोड से ना जोडा जाए'' अखबार ने वैंकैया नायडू के हवाले से लिखा है कि लॉ कमीशन के इस कदम को सियासत के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।
रोजनामा खबरें ने इससे हट कर भी एक खबर को अपने पहले पन्ने पर जगह दी है। अखबार की सुर्खी है- ''यूनेस्को का ऐतिहासिक फैसला, मस्जिद अक्सा पर यहूदियों का कोई हक नहीं।'' अखबार लिखता है कि संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को ने एक प्रस्ताव को पारित किया है जिसके तहत उसने साफ कर दिया है कि 'मस्जिद अक्सा पर सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों का हक है और यहूदियों का इस पर दावा गलत है।'