बाढ़ की चपेट में आए नेपाल को चीन ने 10 लाख डॉलर की मदद देने की घोषणा की है। मंगलवार को चीन के वाइस प्रीमियर वांग यांग ने नेपाल से द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने की कड़ी में इस मदद की घोषणा की थी।
वांग ने यह घोषणा दोनों देशों के उपप्रधानमंत्री स्तर की बैठक के बाद की है। क्या चीन और नेपाल के बीच बढ़ती घनिष्ठता से भारत को चिंतित होने की जरूरत है? इसे लेकर बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद ने काठमांडू में वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमिरे से बात की। उन्हीं के शब्दों में पढ़िए एक आकलन-
नेपाल में इस बार की बाढ़ काफ़ी भयावह है। पिछले 21 सालों से ऐसी बाढ़ नहीं आई थी। बाढ़ से जानमाल का काफ़ी नुक़सान हुआ है। इससे अब तक कम से कम 120 लोगों की जान जा चुकी है। इसी बाढ़ के मद्देनज़र चीन के वाइस प्रीमियर ने 10 लाख डॉलर की तत्काल मदद देने की घोषणा की है।
वांग यांग अभी नेपाल में पूर्व-निर्धारित दौरे पर हैं। वांग के इस दौरे से दोनों देशों के बीच कई अहम समझौते हुए हैं। दो साल पहले नेपाल में आए भूकंप में भी चीन ने मदद की थी। उस दौरान भारत से भी मदद आई थी। चीन की मदद पर भारत की तरफ़ से आधिकारिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।
भारत के लिए चिंतित होने की वजह इसलिए है क्योंकि नेपाल के तराई क्षेत्र में जो बाढ़ आई है वह भारत की तरफ़ से सीमाई इलाक़े में एकतरफ़ा बनाए गए बांधों के कारण है। ऐसे क़रीब 15 बांध बनाए गए हैं। इन बांधों के कारण नेपाल का ऊपरी इलाक़ा बाढ़ की चपेट में है। इन बांधों के कारण इंसानों की ज़िंदगी के अलावा कई चीज़ें प्रभावित हुई हैं। इसे लेकर भारत के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा भी है कि उसने नेपाल में अनाधिकृत रूप से बांधों का निर्माण किया है।
ऐसे में चीन मदद करता है तो इसका एक मनोवैज्ञानिक संदेश जाता ही है। वो भी तब जब भारत और चीन के बीच सीमा पर भारी तनाव है। ज़ाहिर है इस स्थिति में भारत की नकारात्मक प्रतिक्रिया हो सकती है। भारत ने भूकंप के बाद जो मदद की थी उसे लेकर नेपाल में लोगों का सकारात्मक रवैया रहा था।
उसी तरह चीन की मदद भी मिली थी। भारत के साथ संबंध ख़राब 2015 में आर्थिक नाकेबंदी के कारण हुआ था। इसी दौरान भारत विरोधी भावना चरम पर पहुंच गई थी। भारत की तरफ़ अगर कोई मजबूत पहल की गई तभी स्थिति में सुधार संभव है।