नेपाल अपने नए संविधान को लागू करने से बस एक कदम दूर है। सात सालों की उठापटक के बाद और सात प्रांतों के मॉडल वाले संविधान मसौदे पर मधेस पार्टियों के विरोध के बीच संविधान सभा ने बुधवार को नया संविधान पारित कर दिया है।
संविधान सभा के अध्यक्ष सुभाष नेमवांग ने ऐलान करते हुए कहा कि 601 सदस्यीय सभा में नया संविधान 25 के मुकाबले 507 वोटों से पारित हो गया। इस ऐलान के साथ सांसदों ने ध्वनिमत से अपना हाथ उठाकर खुशी का इजहार किया।
अब नए संविधान पर सांसदों के हस्ताक्षर होंगे और अध्यक्ष की मंजूरी के बाद यह प्रभावी हो जाएगा। नेपाल के राष्ट्रपति 20 सितंबर को इसका ऐलान करेंगे। शुक्रवार को सांसद इस पर दस्तखत करेंगे। बीते कई दिनों से संविधान सभा में नए संविधान के मसौदे के हरेक अनुच्छेदों पर वोटिंग कराई जा रही थी। संसद में मौजूद 532 सांसदों में से 507 सांसदों ने पूरे मसौदे का समर्थन किया।
मसौदे को नेपाल की तीन बड़ी पार्टियों नेपाली कांग्रेस, सीपीएन-यूएमएल और यूसीपीएन-माओवादी ने समर्थन किया था। तभी से इसका पारित होना तय माना जा रहा था। क्योंकि संविधान सभा में इन तीन पार्टियों का बहुमत है। मधेस समेत कई छोटी पार्टियों ने मसौदे का प्रतिनिधित्व को लेकर विरोध किया था।
नेपाल ने 2006 में खुद को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया था। वहीं संविधान विरोधी हिंसा में 45 लोगों की जान जा चुकी है। इस बीच, नए नेपाली संविधान की घोषणा से पहले भारत की सीमा से सटे दक्षिणी मैदानी इलाकों समेत पूरे नेपाल में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है।
संविधान में हैं308 अनुच्छेद
संविधान में कुल 308 अनुच्छेद हैं। अब 20 सितंबर को राष्ट्रपति संविधान को लागू करने की घोषणा करेंगे। संविधान के लागू होते ही नए प्रधानमंत्री, स्पीकर और राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
हिंदू समर्थक और राजशाही समर्थक राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी नेपाल के 25 सांसदों ने मसौदे के विरोध में वोटिंग की थी। जबकि सभा में मधेस पार्टियों के 60 सदस्यों ने सात प्रांतों के मॉडल की वजह से वोटिंग से अपनी दूरी बनाए रखी।
संविधान के अनुच्छेदों को पारित करने को लेकर खुश नहीं
राष्ट्रपति डॉ. रामबरन यादव कांग्रेस, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले ) और एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) द्वारा संख्या बल के आधार पर संविधान सभा में संविधान के अनुच्छेदों को पारित करने को लेकर खुश नहीं हैं।
मधेसी, थारु जनजाति सहित देश के 50 फीसदी से अधिक नागरिक अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। संविधान प्रक्रिया पूरी होने पर हाथ मिलाते नेपाली पीएम, प्रचंड और अन्य।
भारतीय राजदूत रंजीत रे ने कहा कि मधेसी और थारु समेत अन्य समुदायों की भावनाओं का सम्मान किए बिना नया संविधान भविष्य में स्थायी नहीं रह पाएगा। उन्होंने कहा कि भारत का मानना है कि मधेसी और थारु भले ही बहुमत में न हों, लेकिन उन्हें भी संवाद के माध्यम से शामिल किया जाना चाहिए।