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जापान में तेजी से फैल रहा है खतरनाक 'हे फीवर', टोक्यो की आधी आबादी पर मंडराया महामारी का खतरा

Tue, 24 Apr 2018 04:11 PM IST
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो
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जापान के लोगों को दुनिया में सबसे ज्यादा मेहनती माना जाता है। यहां लोग अपनी नौकरी को बहुत ही महत्वपूर्ण मानते हैं। चाहे पुरुष हों या स्त्री सभी अपने देश के आर्थिक विकास के लिए काम करना जरूरी समझते हैं। यही कारण है कि हिरोशिमा और नागासाकी हमले से पूरी तरह बर्बाद हो चुका जापान आज दुनिया के विकसित देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहा है। लेकिन इस वक्त जापान के आर्थिक विकास को नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। जिसका कारण है जापान में तेजी से फैल रहा 'हे फेवर'। जिसे आम तौर पर पराग ज्वर भी कहा जाता है।

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इस बार 'हे फीवर' के मौसम का रिकॉर्ड टूट चुका है। प्रशासन के लिए इस गंभीर राष्ट्रीय बीमारी को खत्म करना बेहद जरूरी हो गया है। इस समस्या की जड़ें भी राष्ट्र द्वारा किए गए प्रयासों में ही छुपी हैं। जिसके तहत दूसरे विश्व युद्ध के बाद पुनर्वनरोपण किया गया था। यह एक मौसमी एलर्जी है जो कि मौसम के बदलने के साथ होती है और आमतौर पर वसंत या पतझड़ के मौसम में होती हैं। इस बीमारी को एलर्टिक राइनिटिस भी कहा जाता है। वहीं वसंत आते ही देश में पेड़ों से काफी संख्या में पराग निकलने की वजग से ये ज्वर होता है। जो कि बीते हफ्ते से और भी ज्यादा बढ़ गया है। जिस कारण लोगों को एलर्जी का सामना करना पड़ रहा है। इससे बचाव के लिए सब अपने चेहरे पर मास्क लगाकर रख रहे हैं और अधिकतर समय अपने घर में ही बिता रहे हैं। 

इस फीवर की पहचान सर्दी जैसी छींक आना, नाक बहना, साइनस में दबाव, संकुचन, आंखों में खुजली होना और आंखों से पानी निकलना जैसे लक्षणों से की जाती है। सामान्य तौर पर होने वाला जुकाम वायरस से होता है लेकिन 'हे फीवर' किसी वायरस के कारण नहीं होता है। यह एक एलर्जिक स्थिति है जो कि प्रर्यावरण में मौजूद एलर्जी पैदा करने वाले तत्वों के कारण होती है। नेशनल फोरेस्ट्री एजेंसी की ताकाशी नाकामुरा का कहना है कि यह फीवर उनके लिए बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि वानिकी पनपने के जरिए इसे खत्म करने की कोशिश की जाएगी। उन्होंने कहा कि अगर वह उन पेड़ों को नहीं काटेंगे तो वह उसके बदले में ऐसे पेड़ भी नहीं लगाएंगे जो कम संख्या में पराग (पोलेन) निकालते हों।  

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लोगों को खुद करना होगा बचाव

इस बीमारी का देश के उपभोग पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है। फीवर से पीड़ित लोग अधिकतर समय अपने घर की चारदीवारी में ही बिताते हैं जिस कारण वह काम पर नहीं जाते। इसका प्रभाव देश के उत्पादन पर भी पड़ रहा है। इसके अलावा लोग अधिक संख्या में नींद की दवाओं का सेवन कर रहे हैं ताकि इसके असर को कुछ समय के लिए कम कर सकें। 

इस बीमारी की कहानी शुरू होती है साल 1945 से, जब जापान के पहाड़ों पर बड़ी संख्या में सूगी, देशी देवदार और हिनौकी के पेड़ थे। जिन्हें एक तरह का साइप्रस भी कहा जाता है। इसके बाद साल 1970 और 1980 में बागवानी करनी छोड़ दी गई थी। लेकिन ये पेड़ बढ़ते गए जिसके बाद अब यह बड़ी संख्या में पोलेन रिलीज कर रहे हैं। 

हालांकि वैज्ञानिकों ने कृत्रिम किस्मों के पेड़ों का आविष्कार किया है जो उन पेड़ों से 1 फीसदी कम पराग निकालते हैं। लेकिन पेड़ों को काटना और पराग को कम करना काफी महंगा पड़ रहा है। लेकिन फिर भी गवर्नर यूरिको कोइकी का प्रबंधन इस समस्या से निपटने के हर संभव प्रयास कर रहा है। इसके लिए शहर में एक योजना भी बनाई गई है जिसके तहत जंगल के सारे पेड़ काटने के बाद उनकी जगह कृत्रिम पेड़ लगाए जाएंगे। इसमें प्रति वर्ष 60 हेक्टेयर भूमि कवर की जाएगी। जिसपर प्रति वर्ष 80 लाख रुपये की लागत आएगी। वहीं टोक्यो के प्रत्यक्ष नियंत्रण के अंतर्गत ऐसे सारे पेड़ों को खत्म करने में लगभग 500 साल का समय लग जाएगा।

टोक्यो के जंगलों का प्रभार संभालने वाले मामुरो इशिगाकी का कहना है कि वह सभी पेड़ों को नहीं काट सकते हैं। उन्होंने कहा कि पहाड़ों को स्थिर करने और बाढ़ को रोकने के लिए सभी पेड़ों को नहीं काटा जा सकता। इसके अलावा मुख्य अर्थशास्त्री तोशीहीरो नागाहामा का कहना है कि इस फीवर को कम करने के लिए सरकार हर तरह के प्रयास कर रही है लेकिन लोगों को खुद भी इससे बचाव करना होगा। इसके लिए अच्छी से अच्छी दवाइयां उपलब्ध करवाई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि पोलेन को खत्म करने में लंबा समय लग जाएगा। 
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