इस बीमारी का देश के उपभोग पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है। फीवर से पीड़ित लोग अधिकतर समय अपने घर की चारदीवारी में ही बिताते हैं जिस कारण वह काम पर नहीं जाते। इसका प्रभाव देश के उत्पादन पर भी पड़ रहा है। इसके अलावा लोग अधिक संख्या में नींद की दवाओं का सेवन कर रहे हैं ताकि इसके असर को कुछ समय के लिए कम कर सकें।
इस बीमारी की कहानी शुरू होती है साल 1945 से, जब जापान के पहाड़ों पर बड़ी संख्या में सूगी, देशी देवदार और हिनौकी के पेड़ थे। जिन्हें एक तरह का साइप्रस भी कहा जाता है। इसके बाद साल 1970 और 1980 में बागवानी करनी छोड़ दी गई थी। लेकिन ये पेड़ बढ़ते गए जिसके बाद अब यह बड़ी संख्या में पोलेन रिलीज कर रहे हैं।
हालांकि वैज्ञानिकों ने कृत्रिम किस्मों के पेड़ों का आविष्कार किया है जो उन पेड़ों से 1 फीसदी कम पराग निकालते हैं। लेकिन पेड़ों को काटना और पराग को कम करना काफी महंगा पड़ रहा है। लेकिन फिर भी गवर्नर यूरिको कोइकी का प्रबंधन इस समस्या से निपटने के हर संभव प्रयास कर रहा है। इसके लिए शहर में एक योजना भी बनाई गई है जिसके तहत जंगल के सारे पेड़ काटने के बाद उनकी जगह कृत्रिम पेड़ लगाए जाएंगे। इसमें प्रति वर्ष 60 हेक्टेयर भूमि कवर की जाएगी। जिसपर प्रति वर्ष 80 लाख रुपये की लागत आएगी। वहीं टोक्यो के प्रत्यक्ष नियंत्रण के अंतर्गत ऐसे सारे पेड़ों को खत्म करने में लगभग 500 साल का समय लग जाएगा।
टोक्यो के जंगलों का प्रभार संभालने वाले मामुरो इशिगाकी का कहना है कि वह सभी पेड़ों को नहीं काट सकते हैं। उन्होंने कहा कि पहाड़ों को स्थिर करने और बाढ़ को रोकने के लिए सभी पेड़ों को नहीं काटा जा सकता। इसके अलावा मुख्य अर्थशास्त्री तोशीहीरो नागाहामा का कहना है कि इस फीवर को कम करने के लिए सरकार हर तरह के प्रयास कर रही है लेकिन लोगों को खुद भी इससे बचाव करना होगा। इसके लिए अच्छी से अच्छी दवाइयां उपलब्ध करवाई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि पोलेन को खत्म करने में लंबा समय लग जाएगा।