आज जब आप अरब के बारे में सोचते हैं तो आपके जेहन में तेल, असीम संपदा की तस्वीर उभरती होगी। लेकिन एक सदी से भी कम वक्त हुआ था, जब तेल की खोज होनी बाकी थी।
यह इलाका गरीब था और इसकी आय का मुख्य स्रोत था- मोती की खोज करना। लेकिन औपनिवेशिक सत्ता और सस्ते माल से प्रतियोगिता के चलते यह भी बंद होने वाला था।
"यूसुफ डुबकी लगाने के लिए तैयार था। उसने अपनी टोकरी निकाली, कोने से पकड़ा और पत्थर से बंधी रस्सी से एक पैर में एक घेरा डाला। उसके बाद वह गहराई में उतरता गया, मैं उसे छह, 12, 24 फुट नीचे जाते देखता रहा।"
ऑस्ट्रेलियन खोजी एलन विलियर्स ने अपनी किताब 'सन्स ऑफ सिंदबाद' में 1939 में कुवैत में मोती की खोज का वर्णन कुछ इसी तरह किया है।
"वह कितने समय से अंदर है! ऊपर सन्नाटा छाया हुआ था। रस्सी में खिंचाव हो रहा था और वह लगातार नीचे जा रही थी। यूसुफ को नीचे देखे हुए काफी समय हो गया था। फिर एक धुंधली सी तस्वीर एक आदमी के रूप में बदलने लगी।"
"आखिरकार वह बाहर आ ही गया। सबसे पहले उसकी टोकरी बाहर आई, फिर उसका बूढा सिर। उसने पानी के अंदर की आदी हो गई अपनी आंखों को सूर्य की रोशनी से बचाने के लिए हाथ से ढक रखा था। उसने व्हेल की तरह पानी की फुहार भी छोड़ी।"
विलियर्स जानते थे कि उनकी किस्मत अच्छी है कि वह, मोती की खोज, वाले उद्योग के आखिरी समय को देख और उसकी तस्वीरें ले रहे हैं। वह उद्योग जिसने अरब के तटीय क्षेत्रों की आबादी को कई पुश्तों तक पोसा है।
जापानी संवर्धित (कृत्रिम रूप से पैदा किए गए) मोतियों की 1920 की शुरुआत से दुनिया के बाजार में भरमार हो गई थी। इन सस्ते और प्रचुर मोतियों ने अरब के श्रम-आधारित प्राकृतिक मोतियों की खोज, जो खाडी के गर्म पानी के नीचे सीपों से की जाती थी, को भारी धक्का पहुंचाया।