पिछले कुछ समय में म्यांमार में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं। ऐसी घटनाओं में पिछले एक साल में 200 से अधिक लोग मारे गए हैं। मारे जाने वालों में अधिकतर मुस्लिम समुदाय के लोग हैं।
सांप्रदायिक हिंसा पश्चिमी राखाइन प्रांत से देश के अन्य शहरों में फैल गई है। देश के सागाइंग क्षेत्र में बौद्ध समुदाय के हमले में सैकड़ों मुस्लिम परिवार तबाह हो गए हैं।
इस सबके लिए एक विवादास्पद बौद्ध भिक्षु शिन विराथू और उनके राष्ट्रवादी संगठन को जिम्मेदार माना जा रहा है।
शिन विराथू
इन दिनों म्यांमार के एक सबसे बड़े शहर मंडालय के मासोएयिन में युवा भिक्षुओं को बौद्ध धर्म का उपदेश दे रहे शिन विराथू का मानना है कि उनका देश मुस्लिम आक्रमणकारियों के हमले की चपेट में है।
उनका कहना है, ''मुस्लिम तभी तक बेहतर व्यवहार करते हैं जब तक वे कमजोर होते हैं। जब वे मजबूत हो जाते हैं तो भेड़िए की तरह व्यवहार करने लगते हैं जो अपने क्षेत्र के जानवरों को खा जाता है।''
विराथू का मानना है कि म्यांमार को एक इस्लामिक राज्य बनाने के लिए मुस्लिम एक 'मास्टर प्लान' पर काम कर रहे हैं।
बर्मा की छह करोड़ की आबादी में 90 फीसदी बौद्ध और करीब 5 फीसदी मुस्लिम समुदाय के लोग हैं। विराथू का कहना है, ''पिछले 50 सालों में हमने मुस्लिम समुदाय की दुकानों से खरीदारी की और इस कारण वे अमीर बन गए।
वे हमसे धनी बन गए और वे हमारी लड़कियों को खरीद और उनसे शादी कर सकते हैं। इस तरह उन्होंने न केवल हमारे राष्ट्र बल्कि हमारे धर्म को भी तबाह किया है।''
संगठन '969'
विराथू ने इसका समाधान निकालने के लिए एक विवादित राष्ट्रवादी संगठन '969' बनाया है। यह संगठन बौद्ध समुदाय के लोगों से अपने ही समुदाय के लोगों से खरीदारी करने, उन्हें ही संपत्ति बेचने और अपने ही धर्म में शादी करने की बात करता है।
'969' के समर्थकों का कहना है कि यह पूरी तरह से आत्मरक्षा के लिए बनाया गया संगठन है जिसे बौद्ध संस्कृति और पहचान को बचाने के लिए बनाया गया है।
विराथू और '969' के नेताओं की बातों को सुनकर यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके निशाने पर मुस्लिम समुदाय ही है।
विराथू का कहना है, ''पहले धर्म और जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता था। हम भाईचारे के साथ रहते थे, लेकिन मुसलमानों के मास्टर प्लान के बारे में पता चलने के बाद हम और अधिक चुप नहीं रह सकते।''
दस साल पहले सैन्य सरकार 'जुंटा' के शासन में मुस्लिम विरोधी विचार के लिए विराथू को जेल में डाल दिया गया था। लेकिन अब समय बदल गया है।
उनके संदेश सोशल मीडिया और डीवीडी के जरिए खूब प्रसारित किए जा रहे हैं। इतना ही नहीं अब विराथू को शीर्ष पदों पर बैठे लोगों का समर्थन भी मिल रहा है।
जून महीने में म्यांमार में सांप्रदायिक नफ़रत की कई घटनाएं देखी गईं। उस समय टाइम पत्रिका के आवरण पेज पर विराथू की तस्वीर 'बौद्ध आतंक का चेहरा' नामक शीर्षक से छपी थी।
इसके खिलाफ बौद्ध भिक्षु उग्र हो गए और म्यांमार के राष्ट्रपति थीन सेन विराथू के बचाव में कूद पड़े। टाइम के उस अंक को प्रतिबंधित कर दिया गया और राष्ट्रपति ने एक बयान जारी कर विराथू को 'भगवान बुद्ध का पुत्र' करार दिया।
सुधार में बाधा
म्यांमार में विराथू के बढ़ रहे कद के बारे में कहानियों की कमी नहीं है। कुछ लोगों का मानना है कि म्यांमार की राजनीति में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए सेना धार्मिक उन्माद का इस्तेमाल कर सकती है।
साल 2007 के भगवा क्रांति में हिस्सा लेने वाले एक भिक्षु कयलार सा का कहना है, ''इस बारे में हमें भी आश्चर्य हो रहा है।'' क्रांति के कारण सा को जेल जाना पड़ा था।
उन्होंने कहा कि पिछले साल भिक्षुओं के प्रदर्शन को बुरी तरह कुचल दिया गया था, लेकिन सरकार घृणित भाषण के खिलाफ कुछ नहीं कर रही।
उन्होंने कहा, ''अब हम मानने लगे हैं कि '969' आंदोलन गैरजरूरी है। यदि इस आंदोलन को गंभीरता से लिया जाएगा तो लोकतांत्रिक सुधार में बाधा पैदा होगी।''
विराथू की इन गतिविधियों के कारण मंडालय की सबसे बड़ी मस्जिद की रक्षा करने में लगे मुस्लिम समुदाय के लोगों का कहना है कि बौद्धों के हमले को देखते हुए उन्हें पुलिस और सेना से सुरक्षा की कोई उम्मीद नहीं है।
सन 1988 के छात्र आंदोलन के नेता और मस्जिद से जुड़े समर नई नई का कहना है, ''हर कोई बौद्ध और मुस्लिम समुदाय के बीच हिंसा के बारे में बात कर रहा है।
कोई भी इरावदी नदी पर बांध और गैस पाइपलाइन के बारे में बात नहीं कर रहा है। अगर कोई इन चीज़ों को नियंत्रित कर रहा है तो वह बेहद चालाक आदमी है।''