पचास के दशक में तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद भूटान का झुकाव तुरंत ही भारत की तरफ हो गया था। इसकी दो वजहें थीं, दोस्ती और सुरक्षा। इसके बाद से ही भूटान भारत के प्रभाव में रहा है। भारत भूटान को आर्थिक, सैनिक और तकनीकी मदद मुहैया कराता है। भारत की तरफ से दूसरे देशों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता का सबसे बड़ा लाभ भूटान को ही मिलता है। पिछली पंच वर्षीय योजना में भारत ने भूटान को 80 करोड़ डॉलर की मदद दी थी। भूटान में सैंकड़ों भारतीय सैनिक तैनात हैं। अधिकारियों का कहना है कि ये भूटानी सैनिकों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। भूटान का सैनिक हेडक्वॉर्टर 'हा' शहर में है जो दोकलम से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। एक तरफ, दशकों से भूटान को मिल रही भारतीय मदद के लिए लोग शुक्रिया अदा करने वाले लोग मिल जाते हैं तो दूसरी तरफ नई पीढ़ी ये चाहती है कि भूटान अपनी किस्मत खुद तय करे।
राजनीतिक भविष्य
भूटान की विदेश नीति में भारत की सुरक्षा चिंताओं का ख्याल रखा गया है। और इसकी वजह है साल 1949 का भारत-भूटान समझौता। इस समझौते को साल 2007 में संशोधित किया गया। इसके तहत भूटान को विदेश नीति और सैन्य खरीद में ज्यादा आजादी मिली। थिम्पू में कुछ लोग ये महसूस भी करते हैं कि उनके देश पर भारत अपने प्रभाव के कारण मनमानी करता है। लेखक और राजनीतिक विश्लेषक गोपीलाल आचार्य कहते हैं, "एक लोकतंत्र के तौर पर हम जैसे-जैसे परिपक्व होंगे, हम भारत के साये से बाहर निकल पाएंगे।" "भारत को ये भी नहीं सोचना चाहिए कि भूटान उनके अधीन देश है।
भूटान को अपना राजनीतिक भविष्य तय करने दिया जाए।"
दो ताकतवर देश
भूटान और चीन के बीच उत्तर और पश्चिम के इलाके में सीमा विवाद है। ये अहसास बढ़ रहा है कि भूटान को चीन के साथ अपने विवाद सुलझाने का यही सही समय है। राजनीतिक विश्लेषक करमा तेनजिन कहते हैं, "भूटान को जल्द से जल्द इस मुद्दे को चीन से सुलझा लेना चाहिए। इसके बाद ही हम कूटनीतिक दृष्टि से आगे बढ़ सकेंगे।" "अगर ऐसा नहीं हुआ तो दोकलम का मुद्दा फिर से उभरता रहेगा। दो ताकतवर देश भूटान के दरवाजे पर अपने झगड़े नहीं सुलझा सकते।" थिम्पू में मैंने जिन लोगों से बात की, उनमें से कुछ का मानना था कि भारत को संयम बरतना चाहिए था और चीन से झगड़ा करने से बचना चाहिए था। उन्हें ऐसा लगता है कि भारत के रवैए की वजह से भूटान को चीन से अपने विवाद सुलझाने में दिक्कत आएगी।
नेपाल का उदाहरण
नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश जैसे दक्षिण एशियाई देशों में चीन को सड़क बनाने से रोकने में भारत नाकाम रहा है। दक्षिण एशिया में भूटान एकमात्र ऐसा देश है जिसका चीन के साथ कोई कूटनीतिक संबंध नहीं है। भूटान में एक तबके को ये भी लगता है कि भारत उनके देश से अनुचित तरीके से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहा है। नई दिल्ली के 'बड़े भाई' वाले रवैए के कारण कई लोग चीन से कारोबारी संबंध बनाने की वकालत करते हैं। वे नेपाल की तरफ इशारा करते हैं और कहते हैं नेपाल भारत के साथ अपने संबंधों में चीन का कार्ड अक्सर खेलते रहता है।
बराबरी की बुनियाद
गोपीलाल आचार्य कहते हैं, "हमारे लिए भविष्य भारत के साथ है। लेकिन हमें ऐसे नए संबंधों की नींव रखनी चाहिए जो भारत और भूटान के बीच बराबरी की बुनियाद पर हो।" एक तरफ जहां भारत को चीन की बढ़ती हुई चुनौतियों से सैनिक और आर्थिक दोनों ही मोर्चों पर दोचार होना पड़ रहा है, वहीं इस बात का खतरा भी है कि अगर विदेश नीति पारस्परिक सम्मान की बुनियाद पर खड़ी न हो तो दोस्त हाथ से छिटक भी सकते हैं। भूटान भले ही एक छोटा पहाड़ी देश है लेकिन उसकी अपनी रणनीतिक अहमियत है। वो ये हर्गिज नहीं चाहेगा कि भारत और
चीन की दुश्मनी के बीच वो पिसकर रह जाए। भूटान की सीमा पर भारत और चीन के सैनिक एक दूसरे पर बंदूक ताने खड़े हों, भूटानी लोग ये बात सबसे आखिर में देखना चाहेंगे।