फिल्मों पर हमारी संस्कृति को बिगाड़ने का आरोप लगाना सही नहीं है। फिल्में तो उन्ही रंगों को दिखाती हैं जिनमें समाज रंगा होता है। ये विचार 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन के दूसरे दिन रविवार को यहां विशेष चर्चा सत्र में वक्ताओं ने व्यक्त किए। प्रसिद्ध गीतकार प्रसून जोशी का कहना था कि फिल्मों के गर्भ में विचार तो समाज से ही आता है। भले ही बॉलीवुड को इंडस्ट्री कहा जाए, लेकिन फिल्मों को चेतना तो समाज से ही मिलती है।
परिवार और स्कूल यदि हमारी संस्कृति को आगे बढ़ाएंगे तो फिल्मों में भी वह दिखाई देगा। हम जो बीज रोप रहे हैं उसे जरूर देखें क्योंकि फूल और फल तो उसी से मिलेंगे। उन्होंने कहा कि घर सभ्यता है तो घर में किचन-बैठक कहां हो, ये संस्कृति है। दूध सभ्यता है तो मक्खन संस्कृति है। जिस तरह समाज और साहित्य का गहरा नाता है, उसी तरह का संबंध फिल्मों से भी है। फिल्में समाज से लेती हैं तो समाज को देती भी हैं। हमें यह देखना है कि संस्कृति के संरक्षण में फिल्मों की क्या भूमिका है?
मॉरीशस की जानी मानी साहित्यकार शशि दुकन की राय थी कि भारतीय संस्कृति और सिनेमा का गहरा संबंध है। हर साल भारत में 1000 फिल्में बनती हैं तो जाहिर है कि उनके विषय समाज से ही उभरते हैं। फिल्मों ने राष्ट्रीय एकता और देश विदेश में हिंदी के प्रचार में गजब की भूमिका निभाई है। मानव संसाधन राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह ने कहा कि जो आदमी को इंसान बना दे वही संस्कृति है।
मनुष्य की प्रकृति एक है इसलिए संस्कार और संस्कृति भी एक है। स्थान के अनुसार भिन्नता होती है। भारत की सोच में विश्व संस्कृति है। लेखक यतींद्र मिश्र ने कहा कि फिल्में कभी भी साहित्य के विकल्प के रूप में नही आयीं। अलग माध्यम के रूप में विकसित हुईं जिसने जीवन को चित्रित करने का काम किया। फिल्मों में जो संस्कृति दिखती है वह हमसे ही फिल्मों में गई है।