पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) को लेकर पाकिस्तान लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि वहां के लोग खुशहाल हैं और पाकिस्तान से प्रेम करते हैं। लेकिन इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप और एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार भोजन की किल्लत, बिजली की अनुपलब्धता, रोजगार का संकट, स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव और सैन्य दमन इन सभी ने मिलकर पीओके को एक दबाया हुआ विस्फोटक क्षेत्र बना दिया है।
पीओके के मुजफ्फराबाद, गिलोत, रावलकोट, मीरपुर, कोटली और हाजीरा जैसे इलाकों में खासतौर से अर्धशहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार की ओर से जो सब्सिडी वाला आटा पहले दिया जाता था, वह महीनों से नहीं मिला है। शहरी इलाकों में भी स्थिति दयनीय है। स्थानीय लोगों के अनुसार जब कभी यह आटा आता भी है तो वह 30-35 रुपए प्रति किलो के बजाय 100 से 120 रुपये किलो तक बिकता है। इससे गरीबों की थाली से रोटी ही गायब हो गई है।
विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) की 2025 की निगरानी रिपोर्ट के मुताबिक पीओके के ग्रामीण इलाकों में 30% से ज्यादा परिवार ऐसे हैं जिन्हें दिन में एक वक्त का भोजन भी नसीब नहीं हो रहा है। सिर्फ गेहूं ही नहीं, दूध, दाल, सब्जियां और अन्य बुनियादी चीजें भी यहां दुर्लभ हो चुकी हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि पीओके की आपूर्ति शृंखला पर सेना का पूरा नियंत्रण है और स्थानीय नागरिकों को हाशिए पर धकेल दिया गया है। नीलम-झेलम जलविद्युत परियोजना पीओके के भीतर स्थित है और इससे पाकिस्तान को लगभग 970 मेगावाट बिजली मिलती है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिस जमीन से यह बिजली पैदा हो रही है, वहीं के लोगों को 14 से 16 घंटे की बिजली कटौती झेलनी पड़ रही है। कभी-कभी तो तीन से चार दिन तक लगातार बिजली गुल रहती है।
संयुक्त राष्ट्र से मानवाधिकार उल्लंघनों की स्वतंत्र जांच की मांग
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएन एचआरसी) और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से यह मांग की है कि वे पाकिस्तान पर दबाव बनाएं कि पीओके में जमीन अधिग्रहण, गैरकानूनी हिरासत और मानवाधिकार उल्लंघनों की स्वतंत्र जांच कराई जाए। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि पाकिस्तान में मीडिया की सेंसरशिप और सेना के दबाव के कारण इन घटनाओं की आवाज बाहर नहीं आ पा रही है। द फॉरगॉटेन कश्मीर रिपोर्ट में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने स्पष्ट कहा है कि पीओके में सेना के नियंत्रण में आम नागरिकों के लिए कोई न्यायिक रास्ता उपलब्ध नहीं है। 2022 से 2025 के बीच पीओके में करीब 600 से अधिक परिवारों को उनकी जमीनों से बेदखल किया गया, जिनमें से अधिकांश को ना मुआवजा मिला, ना कानूनी मदद। जो आवाज उठाते हैं उन्हें या तो गायब कर दिया जाता है, या राष्ट्रविरोधी का टैग लगाकर जेल में डाल दिया जाता है। जो गायब हो जाते हैं वह फिर कभी घर नहीं लौटते।
जिंदगी नहीं, बस जिंदा रहने की जद्दोजहद
रिपोर्ट कहती है कि पाकिस्तान के कब्जे में रहते हुए पीओके के लोगों को ना सिर्फ उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है बल्कि उनकी अस्मिता, स्वतंत्रता और मूलभूत मानवाधिकारों को भी रौंदा जा रहा है। इसलिए वहां भड़क रहा विद्रोह कोई राजनीतिक साजिश नहीं, एक कुचले हुए, भूखे, अंधेरे में जी रहे और असहाय समाज की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। यह उस 'अमन' का नकली पर्दा फाड़ चुका है जिसे पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ओढ़ रखा था। अब पीओके के लोग यह जान चुके हैं कि वे पाकिस्तान के नागरिक नहीं, केवल संसाधन हैं जिन्हें जब चाहे छीना जा सकता है।