एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत की पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियां आगे भी पाकिस्तान और चीन के इर्द-गिर्द केंद्रित रहेंगी। सिंगापुर में सप्ताहांत में अंतरराष्ट्रीय रक्षा संवाद आयोजित होने जा रहा है, उससे पहले एक रिपोर्ट जारी हुई है, जिसमें यह दावा किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भविष्य में किसी भी संभावित पारंपरिक युद्ध की प्रकृति स्थानीय ही रहेगी। लंदन स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज (IISS) की 'एशिया-पैसिफिक रीजनल सिक्योरिटी असेसमेंट' (APRSA) नामक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अपने दोनों परमाणु संपन्न पड़ोसी देशों के साथ लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवादों के कारण बड़े पैमाने पर पारंपरिक सैन्य अभियानों के लिए सेना को तैयार कर रहा है।
भारत और चीन की सीमाएं संवेदनशील बनी रहेंगी
रिपोर्ट के अनुसार, चीन के साथ भारत के सीमा विवाद अपेक्षाकृत पारंपरिक प्रकृति के हैं और इनके भारत-पाक संघर्षों जैसी तीव्रता तक पहुंचने की संभावना कम है। इसके बावजूद भारत की चीन और पाकिस्तान दोनों के साथ सीमाएं सैन्य रूप से संवेदनशील बनी रहेंगी। हिंद महासागर क्षेत्र से बाहर भारत की व्यापक एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सक्रिय सैन्य भूमिका निभाने की संभावना कम है। साथ ही भारत, ताइवान को लेकर संभावित अमेरिका-चीन संघर्ष से भी दूरी बनाए रखने की कोशिश करेगा।
न युद्ध, न शांति वाली स्थिति बनी रहेगी
रिपोर्ट में भारत की स्थिति को 'न युद्ध, न शांति' वाली हाइब्रिड चुनौती बताया गया है, जिसमें चीन और पाकिस्तान दोनों शामिल हैं। इसमें कहा गया है कि पाकिस्तान और चीन के खिलाफ अभियानों से मिले अनुभवों के आधार पर भारतीय सैन्य सिद्धांत लगातार विकसित हो रहे हैं और उनकी प्रभावशीलता भी बढ़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार, 2016, 2019 और 2025 में पाकिस्तान के खिलाफ की गई सर्जिकल स्ट्राइक ने भारत की सैन्य रणनीति और सिद्धांतों के विकास को प्रभावित किया है।
अमेरिका-चीन संघर्ष को लेकर कही गई ये बात
रिपोर्ट में अमेरिका और चीन की सैन्य रणनीतियों में ताइवान को प्रमुख केंद्र बताया गया है। अमेरिका जहां ताइवान की सुरक्षा और मजबूती पर जोर दे रहा है, वहीं चीन अमेरिकी हस्तक्षेप को रोकने की रणनीति पर काम कर रहा है। इसके अलावा, हिंद महासागर क्षेत्र के प्रमुख सामरिक मार्गों, खासकर मलक्का जलडमरूमध्य, को लेकर बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य क्षमता के कारण सैन्य उपस्थिति को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है। अंतरराष्ट्रीय रक्षा संवाद 'शांगरी-ला डायलॉग' 29 से 31 मई तक सिंगापुर में आयोजित होगा, जिसमें विभिन्न देशों के रक्षा मंत्री और सैन्य प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे।