कोरोना महामारी का दौर खत्म होने के बाद दुनियाभर मेें मंदी, बेरोजगारी और संरक्षणवाद की चिंताएं बढ़ेंगी और नई संक्रमण बीमारियां पैदा होने का भी जोखिम रहेगा। विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) ने मंगलवार को बताया कि कंपनियों के लिए फिलहाल ये सबसे बड़ी समस्याएं होंगी।
रिपोर्ट के अनुसार, सरकारों-नीति निर्माताओं और कारोबारियों की तमाम कोशिशों के बावजूद अगले 18 महीने तक आर्थिक संकट और सामाजिक असंतोष बढ़ेगा। इससे बड़ी और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बिखरने और सीमापार व्यापार पर बड़ा असर पड़ने की आशंका होगी।
अध्ययन में शामिल 66 फीसदी विशेषज्ञों का कहना था कि वैश्विक मंदी कारोबार के लिए सबसे बड़ा जोखिम बनकर उभरेगी। 50 फीसदी ने उद्योगों के विलय या दिवालिया होने और आपूर्ति शृंखला बाधित होने की आशंका जताई है। डब्ल्यूईएफ की प्रबंध निदेशक सादिया जाहिदी ने कहा, दुनियाभर के नेताओं को मिलकर इस समस्या का व्यापक उपाय खोजना होगा और जोखिम से सभी को निकालने की कोशिश करनी होगी।
भारत का राहत पैकेज जीडीपी का सिर्फ 1 फीसदी: फिच
वैश्विक रेटिंग एजेंसी फिच सॉल्यूशंस ने मंगलवार को दावा किया है कि भारत की ओर से कोरोना संकट से निपटने के लिए दिया गया राहत पैकेज वास्तव में जीडीपी का 1 फीसदी ही है। सरकार इसे 10 फीसदी बता रही है। फिच ने कहा, पैकेज की आधी राशि राजकोषीय कदमों से जुड़ी है जिसकी घोषणा पहले ही की जा चुकी है।
इसमें आरबीआई की मौद्रिक राहत वाली घोषणाओं को भी जोड़ लिया है। सरकार यह जानते हुए भी कि जीडीपी की वृद्धि दर 1.8 फीसदी रहने का अनुमान है, राजकोषीय खर्च बढ़ाने से कतरा रही है। दूसरी ओर, घरेलू और वैश्विक दोनों स्तर पर मांग कमजोर हो रही है। सरकार का मौजूदा पैकेज चुनौतियों से निपटने में सक्षम नहीं है। साथ ही 2020-21 में केंद्र और देश का घाटा बढ़कर 7 और 11 फीसदी हो पहुंच जाएगा।