नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को हटाने की तमाम कोशिशों के बावजूद आखिर कौन सी ऐसी ताकत है, जो उन्हें बार-बार इस संकट से उबार ले जाती है। अगर संवैधानिक तरीके से देखें तो नेपाल के सियासी गणित को ओली ने अपने पक्ष में कर रखा है।
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में लगातार ओली के इस्तीफे की मांग हो रही है, पिछले कई महीनों से उन्हें हटाने की जोड़तोड़ चल रही है, लेकिन इसमें कामयाबी न मिल पाने के पीछे अब सीधे तौर पर नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी पर संदेह किया जा रहा है।
नेपाल के सियासी जानकार ये आरोप लगा रहे हैं कि राष्ट्रपति भंडारी की भूमिका संदेह के घेरे में है।
गुरुवार को जिस तरह ओली ने अफरा-तफरी में संसद सत्र तत्काल प्रभाव से खत्म कर दिया और उस पर राष्ट्रपति ने फटाफट हस्ताक्षर कर दिए, उससे संदेह और गहरा गया है।
इससे पहले अप्रैल में भी बिना पार्टी में चर्चा किए और कैबिनेट के सहयोगियों की राय लिए, जिस तरह ओली ने दो विवादास्पद संविधान संशोधन कराकर गुपचुप राष्ट्रपति से हस्ताक्षर करा लिए उस पर भी सवाल उठे थे।
हालांकि बाद में पार्टी नेताओं के विरोध और ओली की मनमानी को लेकर आवाज उठने के बाद चार दिनों में ही राष्ट्रपति ने ओली के कहने पर अपने उसी फैसले को वापस ले लिया गया था।
काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक मंगलवार की सुबह पार्टी की स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में जाने से पहले ओली ने राष्ट्रपति भंडारी के साथ लंबी बैठक की थी। बाद में वो पार्टी की बैठक में गए जहां ज्यादातर सदस्यों ने ओली से पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री दोनों ही पदों से उनका इस्तीफा मांगा।
उसी दिन शाम को फिर ओली राष्ट्रपति भंडारी से मिलने शीतल निवास गए और लंबी बात की। गुरुवार को सुबह एक बार फिर कैबिनेट की बेहद अहम बैठक से पहले ओली राष्ट्रपति भंडारी से मिलने गए और बाद में कैबिनेट की बैठक में संसद का सत्र तत्काल खत्म करने का फैसला लिया गया।
इस पर भी राष्ट्रपति ने बिना देर किए मंजूरी दे दी।
नेपाल के राजनीतिक विश्लेषकों ने राष्ट्रपति की भूमिका पर सवाल उठाया है और कहा है कि उन्हें देश के अभिभावक की तरह काम करना चाहिए, न कि किसी पार्टी के अंदरूनी मामलों को देखते हुए प्रधानमंत्री की कुर्सी बचाने की कोशिश में भागीदार बनना चाहिए।
दरअसल राष्ट्रपति भंडारी पर ये सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि राष्ट्रपति बनने से पहले वो ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल की एक असरदार नेता और उपाध्यक्ष रही थीं।
राजनीतिक विश्लेषक राजेन्द्र महाजन का मानना है कि भंडारी अब भी पार्टी की नेता की तरह काम कर रही हैं, न कि देश की राष्ट्रपति की तरह। उन्हें पार्टी के भीतर चल रही सारी गतिविधियों और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में ओली विरोधी मुहिम का अच्छी तरह पता है और वो ओली के इशारे पर ही काम कर रही हैं।
साफ है कि गुरुवार को जो राजनीतिक घटनाक्रम हुए उसकी पटकथा ओली और भंडारी ने मिलकर लिखी है। नेपाल के एक प्रोफेसर पूर्णमन शाक्य के मुतबिक भंडारी को ओली से ये पूछना चाहिए था कि उन्होंने बजट सत्र बीच में ही खत्म कर देने का फैसला स्पीकर से बातचीत करने के बाद लिया है या नहीं। इसके लिए सभी पार्टियों की भी राय ली जानी चाहिए थी।
इससे पहले भी राष्ट्रपति भंडारी की भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं। पार्टी के भीतरी विवादों और अंतर्विरोधों को दूर करने में भी भंडारी कई बार मध्यस्थ की भूमिका निभाती रही हैं। गौरतलब है कि पिछले साल नवंबर में ओली और पार्टी के सह अध्यक्ष पुष्प कमल दहल प्रचंड के बीच सत्ता के बंटवारे को लेकर एक समझौता राष्ट्रपति भंडारी ने ही करवाया था।
उस समझौते में तय हुआ था कि ओली पूरे पांच साल प्रधानमंत्री बने रहेंगे और प्रचंड पूरी तरह पार्टी की बागडोर संभालेंगे। लेकिन कुछ ही दिनों बाद ओली ने पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ने से भी मना कर दिया और कहा कि वो पार्टी के सीनियर नेता हैं और अभी वो कुछ समय तक अध्यक्ष पद नहीं छोड़ेंगे।
पूर्व राष्ट्रपति रामबरन यादव के सलाहकार रहे सूर्य ढंगेल ने भी राष्ट्रपति भंडारी के रवैये को गलत बताते हुए उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाया है। एक अन्य पूर्व मंत्री देवेन्द्र राज पांडेय ने भी ट्वीट कर राष्ट्रपति को रबर स्टाम्प करार दिया है।