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ताइवान पर बयान: जुबान लड़खड़ाई या सचमुच मन की बात बोल गए बाइडन?

Tue, 24 May 2022 07:40 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो

सार

विश्लेषकों के मुताबिक अब तक ताइवान के बारे में अमेरिका की नीति उसके ताइवान रिलेशंस एक्ट 1979 से संचालित होती रही है। इस अधिनियम में प्रावधान है कि पर्याप्त सुरक्षा क्षमता बरकरार रखने के लिए अमेरिका ताइवान को सहायता देगा। लेकिन इसमें इसका उल्लेख नहीं है कि क्या वह ताइवान की रक्षा के लिए अपने सैनिक तैनात करेगा...
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क्वाड समिट में अमेरिकी राष्ट्रपति का संबोधन - फोटो : ANI
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विस्तार
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अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के ताइवान के बारे में दिए ताजा बयान के बाद इस बारे में कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या अमेरिका ने इस मुद्दे पर ‘रणनीतिक अस्पष्टता’ की नीति छोड़ दी है। अमेरिका कम से कम साढ़े चार दशक से इस नीति का पालन कर रहा है। ज्यादातर विश्लेषकों की राय है कि इस बार बाइडन का बयान उस तरह का नहीं है, जैसा वे अतीत में गलती से देते रहे हैं।

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सोमवार को बाइडन जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा के साथ एक प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित कर रहे थे, तभी उनसे यह सवाल पूछा गया कि क्या अगर जरूरी हुआ, तो अमेरिका ताइवान की रक्षा के लिए सैनिक हस्तक्षेप करेगा। इस पर बाइडन ने कहा- ‘हमने इसके लिए खुद को वचनबद्ध कर रखा है।’

बाइडन के बयान से ताइवान में खुशी

व्हाइट हाउस ने सफाई दी है कि बाइडन की टिप्पणी का मतलब अमेरिकी नीति में बदलाव आना नहीं है। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता ने कहा- ‘राष्ट्रपति ने वन चाइना नीति और ताइवान जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता के प्रति अमेरिका की वचनबद्धता को दोहराया है।’ लेकिन ताइवान में बाइडन के बयान से उत्साह देखा गया है। ताइवान के विदेश मंत्रालय ने ताजा टिप्पणी के लिए राष्ट्रपति बाइडन को धन्यवाद दिया।

चीन में भी यही समझ बनी है कि इस बार मामला राष्ट्रपति बाइडन की जुबान लड़खड़ाने का नहीं है। चीन ने अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया में ऐसे किसी दुस्साहस के प्रति अमेरिका को कड़ी चेतावनी दी है। उधर चीन के सरकारी मीडिया में कहा गया है कि अब बाइडन प्रशासन अमेरिका की ‘वन चाइना’ नीति को निरर्थक कर देने की तरफ कदम बढ़ा रहा है। सरकार समर्थक अखबार ग्लोबल टाइम्स में छपी एक टिप्पणी में चेतावनी दी गई है कि अमेरिका अगर ताइवान की ‘आजादी’ में मददगार बनने की कोशिश की, तो उसे चीन की कड़ी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ेगा। टिप्पणी में कहा गया है कि चीन अपने इस ‘मुख्य हित’ पर कोई समझौता नहीं कर सकता।

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विश्लेषकों के मुताबिक अब तक ताइवान के बारे में अमेरिका की नीति उसके ताइवान रिलेशंस एक्ट 1979 से संचालित होती रही है। इस अधिनियम में प्रावधान है कि पर्याप्त सुरक्षा क्षमता बरकरार रखने के लिए अमेरिका ताइवान को सहायता देगा। लेकिन इसमें इसका उल्लेख नहीं है कि क्या वह ताइवान की रक्षा के लिए अपने सैनिक तैनात करेगा। इसे ही अमेरिका की ‘रणनीतिक अस्पष्टता’ की नीति कहा जाता रहा है।

यूक्रेन की गलती नहीं दोहराना चाहता अमेरिका

अमेरिकी विश्लेषकों की दलील है कि यूक्रेन फौज ना भेजने की अमेरिकी नीति के कारण रूस का उस पर हमला करने के लिए हौसला बढ़ा। अब अमेरिका ताइवान के मामले में वैसी गलती नहीं दोहराना चाहता। अमेरिका सरकार से जुड़े सूत्रों ने पश्चिमी मीडिया से कहा है कि बाइडन के बयान का मतलब ताइवान की आजादी का समर्थन करना नहीं है। बल्कि इसका मकसद सिर्फ यह सुनिश्चित करना है कि चीन ताइवान पर हमला न करे।

बाइडन से मंगलवार को यह पूछा गया कि क्या एक दिन पहले के उनके बयान का मतलब ‘रणनीतिक अस्पष्टता’ की नीति पर विराम लग जाना है। इसके जवाब में बाइडन ने कहा- ‘नहीं।’ विश्लेषकों के मुताबिक व्हाइट हाउस ने अपने स्पष्टीकरण और राष्ट्रपति ने ताजा बयान से अमेरिका की ताइवान नीति से जुड़ी रणनीतिक अस्पष्टता पर जोर देने की कोशिश की है। लेकिन यह निर्विवाद है कि इस बयान से चीन और ताइवान दोनों ने विपरीत संदेश ग्रहण किया है।

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