ओपेक से हटने की घोषणा कर चुके कतर को यह लग सकता है कि जीसीसी की सदस्यता से उसे वास्तविक रूप से कुछ हासिल नहीं हो रहा लिहाजा इससे हटा जा सकता है। लेकिन यहां कतर की एक कसमसाहट भी है। ओपेक से बाहर हटने का कतर पर बहुत कम प्रभाव पड़ेगा क्योंकि इस लीग के देशों में तेल उत्पादन को लेकर कतर की भागीदारी थोड़ा बहुत प्रभाव ही डालती है।
लेकिन जीसीसी को छोड़ना उसके लिए बहुत महंगा पड़ सकता है जबकि यह एक ऐसा असरहीन समूह है जो यहां के क्षेत्रीय मसलों पर बहुत कम प्रभाव डालता है। यदि कतर इससे अलग होता है तो इससे सऊदी अरब और यूएई के उस दावे को ही बल मिलेगा कि दोहा अरब देशों की एकजुटता को खोखला कर रहा है।
कतर अगर जीसीसी में बना रहा तो वो यह संकेत देगा कि क्षेत्रीय सहयोग को लेकर अपना सहयोग देने को लेकर प्रतिबद्ध है, जिससे सऊदी अरब और यूएई पर यह दबाव बढ़ेगा कि वो आर्थिक नाकेबंदी को खत्म करे।
यह हमेशा संभव लगता रहा है कि सऊदी अरब और यूएई कोई न कोई पेंच फंसा कर कतर को जीसीसी से बाहर निकाल देना चाहते हैं। लेकिन इसके लिए उन्हें कुवैत, ओमान और बहरीन को इसके लिए मनाना होगा।
चाह कर भी कतर को नहीं हटा सकेगा सऊदी
इन देशों में से बहरीन तो सऊदी अरब का ज्यादातर मामलों में साथ देता रहा है लेकिन कुवैत और ओमान अब तक सऊदी अरब की आर्थिक नाकेबंदी पर दृढ़ता से तटस्थ बने रहे हैं। कुवैत ने तो यहां तक कहा है कि वो लंबे चले आ रहे खाड़ी के इस संकट को अगले हफ्ते होने वाले जीसीसी की इस बैठक में सुलझाने की कोशिश करेगा।
इतना ही नहीं यदि जीसीसी से कतर को अलग करने की कोशिश की गई तो यह अमेरिका को रास नहीं आएगा। ईरान को लेकर अमेरिका चाहता है कि अरब देशों में एकजुटता बनी रहे लिहाजा ट्रंप प्रशासन चाहेगा कि कतर के साथ सऊदी अरब के संबंध सुधरे न कि और बिगड़े।
दूसरी ओर जीसीसी में कतर के बने रहने से सऊदी अरब की चिढ़ और बढ़ेगी- इतना ही काफी है कि कतर इस परिषद में बना रहना चाहेगा।
कई जानकारों ने जून 2017 में सऊदी अरब समेत छह देशों मिस्र, बहरीन, यमन, लीबिया और संयुक्त अरब अमीरात के साथ कतर के राजनयिक संबंध टूटने के लिए क्षेत्रीय और ऐतिहासिक कारण को जिम्मेदार बताया था।
दरअसल, कतर 55 साल ब्रिटेन के संरक्षण में रहा है और 1971 में उसने अलग देश के तौर पर वह अस्तित्व में आने से पहले संयुक्त अरब अमीरात का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया था। इसके बाद कतर पर चरमपंथी गुटों का समर्थन करने के आरोप लगते रहे जिससे वो इनकार करता रहा है।
यहां 19वीं सदी के मध्य से ही अल-थानी परिवार का शासन है। अमीर शेख तमीम बिन हमद अल-थानी ने 2013 में अपने पिता शेख हमद बिन खलीफा अल-थानी के गद्दी छोड़ने के बाद सत्ता संभाली थी।
खाड़ी देशों से तनाव
कतर और अन्य खाड़ी देशों के बीच तनाव की शुरुआत तब हुई जब मिस्र के इस्लामिक राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी को सेना ने 2013 में पद से हटा दिया था। सऊदी सरकार संचालित मीडिया में कई बार मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड के लिए कतर के कथित समर्थन को लेकर असंतोष की खबरें आती रही हैं।
मोहम्मद मोर्सी हिज्बुल्ला के सदस्य थे जिसे कई अरब देश चरमपंथी संगठन मानते हैं। मार्च 2014 में सऊदी अरब, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ने कतर पर उनके आंतरिक मामलों में दखल देने का आरोप लगाते हुए अपने राजदूत वापस बुला लिए थे। मिस्र ने इससे पहले अल-जजीरा पर चरमपंथ भड़काने और फर्जी खबरें बनाने का आरोप लगाया था।
कतर में तेल, गैस की ताकत
ईरान और रूस के बाद कतर दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार वाला देश है। इसके साथ ही पेट्रोलियम का भी विशाल भंडार है। बेशक सऊदी अरब ने उस पर आर्थिक और राजनयिक नाकेबंदी कर रखी है लेकिन इसके बावजूद अरब देशों में उसकी ताकत बेशुमार है। तेल और गैस से मिलने वाले बेशुमार पैसे का निवेश कतर दुनिया भर के देशों में करता है।
न्यूयॉर्क के ऐम्पायर स्टेट बिल्डिंग, लंदन के सबसे ऊंचा टावर द शार्ड, ऊबर और लंदन के डिपार्टमेंट्ल स्टोर हैरेड्स में कतर के सुल्तान की बड़ी हिस्सेदारी है। इसके अलावा दुनिया की कई बड़ी कंपनियों में कतर की हिस्सेदारी है।
बात यदि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक मोर्चे पर कतर के ताकत की करें तो सूडान के दारफूर में शांति प्रयासों में वो मध्यस्थ की भूमिका अदा कर चुका है और फलस्तीनी गुटों में भी वो बीच बचाव करता रहा है।अफगान और तालिबान के बीच शांतिवार्ता में भी कतर मध्यस्थ की भूमिका में है।
अल-जजीरा भी कतर का ही टेलीविजन नेटवर्क है जिसने अरब दुनिया में खबरों को परोसने के तरीके में काफी बदलाव किया। इसकी वजह से दुनिया भर में इसने अपनी एक जगह बनाई। कतर एयरवेज की आज दुनिया के चुनिंदा हवाई सेवा में गिनती होती है और 2022 का फुटबॉल विश्व कप भी यहीं आयोजित होने जा रहा है।
वो अरब दुनिया का ऐसा पहला देश है जो इस टूर्नामेंट की मेजबानी कर रहा है। हालांकि इस आयोजन के निर्माण कार्यों में विदेशी कामगारों के शोषण की खबरें भी लगातार मीडिया में रहती हैं।
आर्थिक मजबूती
सऊदी के नाकेबंदी के एक महीने बाद कतर के वित्त मंत्री अली शरीफ अल-ईमादी ने कहा था कि उनके देश में बेशुमार अमीरी है इसलिए पड़ोसियों को रास नहीं आता है।
यहां किस हद तक अमीरी है इसका अंदाजा केवल इससे लगाया जा सकता है कि कतर में प्रति व्यक्ति जीडीपी 124 से 900 डॉलर तक है। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की नजर में यह प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में पहले नंबर पर है। कई लोगों का कहना है कि कतर इस नाकेबंदी के कारण और मजबूत हुआ है, क्योंकि उसने पूरा ध्यान अंतरराष्ट्रीय निवेश पर लगाया।
सऊदी अरब को अमेरिका का साथ
दूसरी तरफ इस्ताम्बुल स्थित सऊदी दूतावास में दो अक्टूबर को पत्रकार जमाल खाशोज्जी की हत्या के बाद से सऊदी अरब की न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हो रही है बल्कि हर मोर्चे पर उसका साथ दे रहे अमेरिका के ट्रंप प्रशासन पर भी अंदरूणी दबाव बढ़ता जा रहा है।
हालांकि इस सब के बावजूद ट्रंप ने अपने बयान में ईरान के खिलाफ अमेरिकी लड़ाई में सऊदी अरब को अहम सहयोगी माना है। इसकी वजह सऊदी अरब में दुनिया के कुल तेल भंडार का 18 फीसदी पेट्रोलियम मौजूद होना, अमेरिका में बड़ा निवेश और उसका अमेरिकी हथियारों का बड़ा खरीदार होना है।
दुनिया भर में हथियारों का सबसे बड़ा विक्रेता खुद अमेरिका है और इन हथियारों का करीब आधा हिस्सा वो अकेले मध्य पूर्व के देशों को बेचता है। सऊदी अरब न केवल अमेरिकी हथियारों का बल्कि मध्य पूर्व के किसी भी देश से अधिक हथियार खरीदता है। वो दुनिया में बेचे जाने वाले कुल हथियार का करीब दसवें हिस्से का खरीदार है।
खाशोज्जी की हत्या के बाद से पिछले कुछ दिनों के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पर क्राउन प्रिंस सलमान से दूरी बनाने का दबाव जरूर है लेकिन ये जगजाहिर है कि उनका सऊदी अरब के प्रति प्रेम उसके (सऊदी के) करोड़ों डॉलर के निवेश की वजह से है। खुद राष्ट्रपति ट्रंप ने नवंबर में कहा था कि "मुझे अमेरिका में 110 बिलियन डॉलर के निवेश को रोकने का विचार पसंद नहीं है।"
ट्रंप प्रशासन की प्रतिक्रिया इस स्थिति को और भी बदतर बना सकती है। सऊदी अरब जिस तरह ट्रंप के साथ कदम से कदम मिला कर चल रहा है उससे संभावना यह भी जताई जा रही है कि कहीं कतर-सऊदी संघर्ष कतर-अमेरिकी संघर्ष में तब्दील न हो जाए।
यदि ऐसा होता है तो कतर में अमेरिका के 10 हजार सैनिकों वाले सैन्य बेस का क्या होगा। ये वो ही सैन्य बेस है जिसका अमेरिका ने 2003 में इराक हमले के दौरान उपयोग किया था।
इतना ही नहीं अमेरिका के कहने पर जिन इस्लामिक संगठनों के साथ कतर मध्यस्थता कर रहा है उसका क्या होगा? इतना ही नहीं, मध्य पूर्व के अन्य देशों के बीच भी इससे गलत संदेश जाएगा कि यदि सऊदी से मुकाबला किये तो उनके साथ कतर जैसा सलूक होगा।