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क्या तालिबान को लेकर रूस, चीन और पाक की चाल में फंस गया है अमेरिका? अब क्या करेंगे ट्रंप

Tue, 17 Sep 2019 07:06 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
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taliban leaders and kabulov in Moscow - फोटो : Youtube
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अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत रद्द होने की खबरों के बाद अफगानिस्तान से सटे देश अपना नफा-फायदा गिनने में जुट गए हैं। जहां पाकिस्तान ने अमेरिका की गुडबुक में आने के लिए अपने स्तर पर बातचीत को पटरी पर लाने के प्रयास शुरू दिये हैं, तो रूस भी शांति वार्ता को सार्थक बनाने में जुट गया है। बातचीत टूटते ही तालिबान ने रूस के विशेष राजदूत जमीर काबुलोव से मुलाकात की। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने एक बार फिर तालिबान को चेतावनी देते हुए इसे तालिबान की अब तक की सबसे बड़ी गलती बताते हुए कहा कि उन्हें अंदाजा भी नहीं होगा कि इससे बाहर कैसे निकलेंगे।

ट्रंप ने दी चेतावनी

ट्रंप ने तालिबान पर निशाना साधते हुए कहा कि तालिबान अच्छे से जानता है कि उसने बहुत बड़ी गलती की है और अब उन्हें इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। 9-11 सितंबर की बरसी के दौरान काबुल स्थित अमेरिकी दूतावास के पास कार बम धमाका करके एक अमेरिकी सैनिक समेत 12 लोगों की मौत हो गई थी और तालिबान ने इस हमले की जिम्मेदारी ली थी। जिसके बाद नाराज ट्रंप ने कैंप डेविड में होने वाली शांति वार्ता तोड़ने का एलान कर दिया था।

ट्रंप ने एकतरफा वार्ता रद्द की

वहीं आगामी राष्ट्रपति चुनावों में उम्मीदवार और हिज्ब ए इस्लामी पार्टी के नेता गुलबुद्दीन हिकमतयार का कहना है कि शांति वार्ता की फिर से बहाली अपरिहार्य है। उसका कहना है कि ट्रंप ने एकतरफा वार्ता रद्द की है और यह तालिबान के लिए भी आश्चर्यपूर्ण है। बातचीत ठीक से चल रही थी और कुछ ही घंटों में समझौते पर दस्तखत होने वाले थे, अचानक से ट्रंप ने वार्ता रद्द करने का एलान कर दिया।

राजनीति में वापस लौटा ‘काबुल का कसाई’

गुलबुद्दीन हिकमतयार को ‘काबुल के कसाई’ के नाम से जाना जाता है और तकरीबन 20 साल बाद अफगान की राजनीति में वापस लौटे हैं। गुलबुद्दीन अगानिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री रहे हैं और 80 के दशक में मुजाहिद्दीनों की अगुवाई कर चुके हैं। 90 के दशक में अफगानिस्तान में छिड़े गृह युद्ध में उनके सगंठन हिज्ब ने दूसरे संगठनों के इलाकों पर कब्जा करने के लिए इतने रॉकेट दागे थे कि इन्हें 'रॉकेटआर' भी कहा जाने लगा। लेकिन जब लोगों ने तालिबान का स्वागत किया, तो ये काबुल से भाग गए।

नाटो बना रहेगा अफगानिस्तान में

इस बीच नाटो मिलिट्री कमिटी के चेयरमैन एयरचीफ मार्शल सर स्टुअर्ट पीच का कहना है कि जब तक देश में शांति और सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती गठबंधन पहले की तरह अफगान नेशनल सिक्योरिटी एंड डिफेंस फोर्सेज की मदद करता रहेगा। नाटो का मानना है कि अफगानिस्तान में संघर्ष का एक स्थायी समाधान केवल सैन्य तरीकों से नहीं हो सकता है, और नाटो अफगानिस्तान में अपने मिशन के लिए प्रतिबद्ध है।   

2,300 अमेरिकी सैनिकों की मौत

1996 से 2001 तक अफगानिस्तान पर शासन कर चुके तालिबान से छिड़े युद्ध में अभी तक नाटो के साढ़े तीन हजार लोगों की लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें से 2,300 अमेरिकी हैं। 2019 में संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि वहां 32 हजार से ज़्यादा आम नागिरकों की मौत हुई है। वहीं खास बात यह है कि 2001 में अमरीकी सैन्य अभियान के बाद से पहली बार अफगानिस्तान में एक बहुत बड़े हिस्से तकरीबन 70 फीसदी हिस्से पर चरमपंथियों का कब्जा हो चुका है।

रूस पहुंचा तालिबान

वहीं अमेरिका से शांति वार्ता रद्द होने के बाद तालिबान का एक गुट रूस पहुंचा और रूस के विशेष दूत जामिर कबुलोव से मुलाकात की। वहीं अमेरिका के पीछे हटने के बाद ताबिलान और रूस एक-दूसरे के नजदीक आ रहे हैं। रूस इससे पहले भी दो बार और तालिबान के साथ बातचीत कर चुका है। लेकिन इस बार अमेरिका के पीछे हटने के बाद रूस दिखाना चाहता है कि अफगानिस्तान में जारी गतिरोध को खत्म करने में उसकी भूमिका अहम हो सकती है।

चीन जाने के संकेत

वहीं अफगान इस्लामिक प्रेस के मुताबिक मास्को के बाद तालिबान का एक प्रतिनिधमंडल चीन जाने की भी योजना बना रहा है। मास्को और चीन के बीच जिस तरह से पिछले कुछ वक्त से दूरियां सिमट रही हैं और तालिबान का वहां जाना कुछ और खिचड़ी पकने का संकेत दे रहा है। हालांकि कतर स्थित तालिबान के राजनीतिक दफ्तर के मुखिया अब्दुल घनी बारादर इस साल जून में चीन की यात्रा कर चुके हैं। चीन ने अफगानिस्तान में 2005 से 350 करोड़ डॉलर का निवेश कर रखा है। वन बेल्ट रोड इनिशिएटिव भी अफगानिस्तान से हो कर गुजरता है।

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