म्यांमार में बिजली का संकट और गहरा गया है। इसे देखते हुए अब सैनिक शासकों ने एक विवादास्पद ऊर्जा परियोजना के निर्माण को मंजूरी दे दी है। कार्यकर्ता समूह इस परियोजना के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं। देश में बिजली उत्पादन गिरने के कारण बीते मार्च से देश में अघोषित लोडशेडिंग चल रही है। बर्मी भाषा के अखबार खित थित की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक लोडशेडिंग का फैसला सैनिक शासन ने लिया था, लेकिन बिना घोषित किए उस पर अमल किया गया। अप्रैल में म्यांमार में कई त्योहार पड़े। उस दौरान बिजली संकट और गंभीर हो गया। खबरों के मुताबिक म्यांमार में बिजली की कमी का साफ असर आम जीवन और कारोबार पर देखा जा सकता है।
वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक दे लांग्रे म्यांमार में बिजली क्षेत्र के सर्व प्रमुख विशेषज्ञों में एक हैं। उन्होंने इस वेबसाइट से कहा- ‘म्यांमार में तख्ता पलट के पहले जितना बिजली उत्पादन होता था, उस स्तर तक देश इस साल के अंत तक नहीं लौट पाएगा। अब पूरी आबादी तक बिजली पहुंचाने की परियोजना लागू करने में भी पहले से ज्यादा वक्त लगेगा।’ आंकड़ों के मुताबिक म्यांमार की तकरीबन 40 फीसदी जनता बिजली से दूर है। ग्रामीण इलाकों में दो तिहाई से ज्यादा घर रोशनी के लिए मोमबत्तियों, केरोसीन, और बैटरियों पर निर्भर हैं।
वेबसाइट निक्कई एशिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक तख्ता पलट से पहले पानी की कमी के कारण बरसात के अलावा बाकी सीजन में म्यांमार सिर्फ 3,100 मेगावाट बिजली पैदा कर पाता था। देश में एलएनजी से चलने वाले दो प्लांट थे, जो 750 मेगावाट बिजली पैदा करते थे। इन संयंत्रों का संचालन एक चीनी कंपनी के हाथ में था। तख्ता पलट के बाद ये संयंत्र बंद कर दिए गए। उससे बिजली संकट और गहरा गया।
इन्हीं हालात के बीच सैनिक शासन ने मेइस्तोने डैम के निर्माण को मंजूरी दी है। 457 फीट ऊंचाई वाले इस डैम के तैयार होने पर इससे छह हजार मेगावाट बिजली बनेगी। लेकिन इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचने का अंदेशा है। परियोजना का विरोध कर रहे संगठन जस्टिस फॉर म्यांमार ने कहा है- ‘म्यांमार की जनता सैनिक शासन के विरोध में एकजुट है। वह मेइत्सोने बांध के प्रति अपना विरोध दिखा चुकी है। इससे उस क्षेत्र के पूरे इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचेगा। इसलिए इस परियोजना को तुरंत रद्द किया जाना चाहिए।’ विश्लेषकों के मुताबिक डैम के बढ़ रहे विरोध का एक और कारण यह है कि इसे बनाने का काम एक चीनी कंपनी को दिया गया है। जबकि चीन के प्रति देश में पहले से विरोध भाव मौजूद है।