फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पोप फ्रांसिस की हालत नाजुक: क्या बीमारी के बीच पद त्याग सकते हैं ईसाई धर्मगुरु, नया पोप कैसे चुना जाएगा? जानें

Mon, 24 Feb 2025 05:48 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला

सार

क्या किसी पोप ने तबीयत खराब होने पर अपना पद छोड़ा है? क्या ऐसा पहले हुआ है और अगर हुआ है तो कब? इसकी प्रक्रिया क्या है? इसके अलावा नए पोप कैसे चुने जाते हैं? आइये जानते हैं...
विज्ञापन
कैथोलिक ईसाइयों के सबसे बड़े धर्मगुरु। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

दुनियाभर में कैथोलिक ईसाइयों के सबसे बड़े धर्मगुरु पोप फ्रांसिस की हालत नाजुक बनी हुई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वे डबल न्यूमोनिया से पीड़ित हैं और उनकी किडनी खराब होने का खतरा भी मंडरा रहा है। वैटिकन की रिपोर्ट्स के मुताबिक, 88 वर्षीय पोप को न्यूमोनिया की वजह से लंग्स में इन्फेक्शन भी हुआ है। इसके चलते उन्हें सांस लेने में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। 
विज्ञापन


ऐसे में यह सवाल उठने लगे हैं कि इस बिगड़ती तबीयत के बीच क्या पोप फ्रांसिस धर्मगुरु के तौर पर अपनी जिम्मेदारियां ठीक ढंग से निभा सकेंगे? क्या कोई पोप तबीयत खराब होने पर अपना पद छोड़ सकता है? क्या ऐसा पहले हुआ है और अगर हुआ है तो कब? इसकी प्रक्रिया क्या है? इसके अलावा नए पोप कैसे चुने जाते हैं? आइये जानते हैं...

1. पहले जानें- पोप फ्रांसिस कितनी गंभीर बीमारी से ग्रस्त?
पोप फ्रांसिस को 14 फरवरी को सांस लेने में समस्या की शिकायत के बाद अस्पता में भर्ती कराया गया था। यहां बीते 10 दिनों से उनकी स्थिति गंभीर होती जा रही हैं। जांच के दौरान उन्हें बाइलेटरल न्यूमोनिया से पीड़ित बताया गया था। यानी उनके फेफड़ों में दोनों तरफ पानी भर गया था। इसके चलते उन्हें सांस लेने में खासा दिक्कत हो रही थी। 

इस बीच पोप फ्रांसिस की अगली जांच में उनकी किडनी के हल्के खराब होने की खबरें भी सामने आईं। यानी उनके खून को छानने और शरीर में ऑक्सीजन लाने-ले जाने की क्षमता दोनों ही खत्म हो रही थीं। ऐसे में डॉक्टरों ने उन्हें लगातार ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा। इसके अलावा खून को भी लगातार साफ करने के लिए ब्लड ट्रांसफ्यूजन किया जा रहा है।

वैटिकन का कहना है कि पोप की स्थिति गंभीर है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने चिकित्सीय सहायता से सामूहिक प्रार्थना में हिस्सा लेना जारी रखा है। दुनियाभर में उनके लाखों-करोड़ों अनुयायियों ने प्रार्थना जारी रखी है। 

क्या खराब होती तबीयत के बीच पोप का पद त्याग सकते हैं पोप फ्रांसिस?
ईसाई धर्म में धर्मगुरु के चुनाव से लेकर उनके अधिकारों तक का जिक्र हैं। इन्हें कैनन लॉ कहा जाता है। कैनन 331 के तहत- रोम के बिशप (पोप) और सभी कैथोलिक चर्च के सर्वोच्च धर्मगुरु को सर्वोच्च, पूर्ण, तात्कालिक और सार्वभौमिक शक्तियां प्राप्त होती हैं। इनका वह स्वतंत्र रूप से कभी भी इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि, इसमें पोप के पद छोड़ने का जिक्र नहीं है। दरअसल, पोप का चुनाव अलग-अलग चर्चों के कार्डिनल (मुख्य पादरी) करते हैं और इन्हें भगवान से सीधे तौर पर जुड़ा माना जाता है। ऐसे में पोप का पद छोड़ना भी उपयुक्त कदम नहीं माना जाता। 

हालांकि, अगर पोप की तबीयत ज्यादा खराब है और वह इसके चलते कैथोलिक ईसाइयों के लिए अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पा रहे हैं, तो वह अपना पद छोड़ सकते हैं। कैनन लॉ के मुताबिक, पोप का खुद से इस्तीफा देने की सबसे अहम शर्त यह है कि यह स्वतंत्रता से दिया गया हो और बिना किसी दबाव के दिया गया हो। इसकी वजह यह है कि यूरोप में पुराने समय में पोप को हटाने के लिए उन पर दबाव बनाया जाता था। इसका एक उदाहरण 1809 में मिलता है, जब फ्रांसीसी जनरल नेपोलियन-1 ने पोप पायस-VII को दो साल तक चैट्यू डी फौन्टैनब्लाउ में बंधक बना कर रखा था। इससे पहले भी नेपोलियन ने पोप पायस-VI को फ्रांस का बंधक बना लिया था। उनकी 1799 में मृत्यु हो गई थी। 

अब तक कौन-कौन से ईसाई धर्मगुरु छोड़ चुके हैं पोप का पद?
ईसाई धर्म के करीब दो हजार वर्षों से ज्यादा के इतिहास में अब तक तीन पोप ऐसे रहे हैं, जिन्होंने किसी न किसी कारण से धर्मगुरु का पद छोड़ दिया। इनमें सबसे ताजा मामला पोप बेनेडिक्ट-XVI के पद छोड़ने का है। जबकि इससे करीब 600 साल पहले तक किसी पोप ने अपना पद नहीं त्यागा था। उनके अलावा सिर्फ पोप सेलेस्टाइन-V और पोप ग्रेगरी-XII ने पोप का पद छोड़ा था। 



 

अब जानें- क्या है नए पोप के चुने जाने की प्रक्रिया?
कैथोलिक चर्च की तरफ से अपने सर्वोच्च पादरी (पोप) को चुने जाने की प्रक्रिया बीते करीब 800 वर्षों से नहीं बदली है। इस सिस्टम को 'पैपल कॉन्क्लेव' भी कहा जाता है। अगला पोप चुनने के लिए इस सिस्टम का ही इस्तेमाल किया जाएगा। पोप चुनने के यह प्रक्रिया पूरी तरह लोकतांत्रिक होती है और अलग-अलग देशों में राजनीतिक दलों के नेता चुनने के समान ही रहती है। यानी कैथोलिक ईसाइयों का सर्वोच्च नेता चुनने की प्रक्रिया को वोटिंग के जरिए अंजाम दिया जाता है। इसके लिए कई चरणों में मतदान कराया जाता है, और यह तब तक जारी रहता है, जब तक पोप पद के लिए उपयुक्त व्यक्ति का चुनाव न हो जाए।

  • पोप चुनने की प्रक्रिया की शुरुआत जिस दिन से तय की जाती है, उस दिन सबसे पहले वोट करने के योग्य 120 कार्डिनल्स के साथ सुबह की प्रार्थना रखी जाती है। यह सभी लोग सिस्टीन चैपल में जुटते हैं, जो कि वैटिकन में 1858 से ही मुख्य पूजाघर बना हुआ है। 
  • इसके बाद दिन में ही एक कार्यक्रम आयोजित किया जाता है, जिसमें सिर्फ पोप चुनने की प्रक्रिया से जुड़े कार्डिनल्स को ही रखा जाता है। यह लोग तब तक कॉन्क्लेव में ही बंद रहते हैं, जब तक वे पोप का उत्तराधिकारी नहीं चुन लेते। इन कार्डिनल को गोपनीयता की शपथ भी दिलाई जाती है। 

  • इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद पोप को चुनने के लिए मतदान कराया जाता है। इसकी कोई गारंटी नहीं है कि पहले राउंड की वोटिंग उसी दिन कराई जाएगी। पोप के चुनाव के लिए अगले कुछ दिन दावेदारों के भाषण, उनकी प्रार्थनाएं और समीक्षा होती है।
  • इसके बाद सिस्टीन चैपल में सभी कार्डिनल्स में से किन्हीं नौ कार्डिनल को चुना जाता है, जो वोटिंग प्रक्रिया में अधिकारियों की भूमिका निभाते हैं और मतदान करवाते हैं। इसके अलावा तीन कार्डिनल इन वोटों की जांच के लिए भी रखे जाते हैं। तीन और कार्डिनल वोट जुटाने और तीन उनकी समीक्षा करते हैं। 

कैसे चुना जाता है पोप?
  • किसी पोप का चुनाव तभी होता है, जब उन्हें दो-तिहाई कार्डिनल्स के वोट हासिल हो जाएं। यानी 120 में से 80 वोट। कई बार जब पोप पद के लिए उम्मीदवार मजबूत होते हैं, तब उन्हें पहले या इसके बाद के कुछ राउंड में ही दो-तिहाई बहुमत मिल जाता है।
  • हालांकि, ऐसा न होने पर वोटिंग जारी रहती है और एक-एक कर के कम वोट पाने वाले उम्मीदवारों को हटाना जारी रखा जाता है। 
  • अगर 33 राउंड्स में वोटिंग के बाद भी पोप के लिए कोई तय नहीं होता तो 34वें राउंड के बाद सबसे ज्यादा वोट हासिल करने वाले टॉप-2 उम्मीदवारों को ही प्रत्याशी रखा जाता है।

पोप चुनने के लिए सबसे लंबी प्रक्रिया 13वीं सदी में की बताई जाती है। तब तीन साल तक पोप का चुनाव नहीं हो सका था। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते कई राउंड में वोटिंग हुई और इसके लिए लंबा समय लिया गया। इस प्रक्रिया के दौरान ही वोट करने के योग्य तीन कार्डिनल की मौत हो गई थी। 

बैलट के जरिए मतदान, इन्हें जलाकर दिया जाता है चुनाव जारी रहने का संकेत
पोप पद के लिए वोटिंग में गुप्त बैलेट का इस्तेमाल होता है। इसकी शुरुआत 1621 में ग्रेगरी XV ने की थी, ताकि कार्डिनल्स के झुकाव पर राजनीति न हो सके। आमतौर पर वोट करने योग्य कार्डिनल अपना मत देते वक्त इसमें अपनी लेखन शैली भी बदल देते हैं, ताकि उनकी पहचान जाहिर न हो सके। 

हर राउंड के बाद इस बैलट पेपरों को सिस्टीन चैपल में ही जला दिया जाता है। इन पेपरों से निकलने वाला काला धुआं, बाहर नए पोप के नाम का इंतजार कर रही भीड़ को यह बताता है कि अभी मतदान जारी रहेगा।  

मतदान के बाद क्या होती है पोप के चुनाव की प्रक्रिया?
दो-तिहाई वोट मिलने के बाद जब कोई एक उम्मीदवार जीत जाता है, तब कार्डिनल्स के समूह का नेतृत्व कर रहे एक कार्डिनल डीन उम्मीदवारों को चैपल में बुलाते हैं और उनसे पोप पद स्वीकार करने पर सवाल पूछते हैं। अगर उम्मीदवार इसके लिए हां कह देते हैं तो पोप को अपना पैपल नेम (पोप बनने के बाद जिस नाम से वे जाने जाएंगे) चुनने को कहा जाता है। आमतौर पर यह नाम ईसाई धर्म के किसी लोकप्रिय संत, पूर्व पोप या कुछ खास मतलब रखने वाले होते हैं।

चूंकि यह नाम कई बार लोकप्रिय संतों और पूर्व पोप के नाम के आधार पर होते हैं, इसलिए इनके आगे एक अंक भी जोड़ा जाता है, ताकि उनकी अलग पहचान स्थापित की जा सके। उदाहरण के लिए 2005 में पोप बेनेडिक्ट XVI ने अपना नाम सेंट बेनेडिक्ट के नाम पर रखा, जो कि कैथोलिक ईसाइयों में बड़े संतों में रहे। रोमन अंकों में XVI का अर्थ है 16 यानी बेनेडिक्ट नाम रखने वाले वे 16वें पोप रहे। उनसे पहले 15 अलग-अलग पोप इस नाम का इस्तेमाल कर चुके थे। 

वैटिकन के आधिकारिक दस्तावेजों में आगे से पोप के लिए यही नाम इस्तेमाल होते हैं और उनके पूर्व (असल) नामों का इस्तेमाल नहीं किया जाता।
विज्ञापन

कैथोलिक ईसाइयों के पहले धर्मगुरु के नाम पर किसी पोप ने नहीं रखा अपना नाम
इन नामों को रखने के बीच एक तथ्य यह भी है कि यीशू मसीह के 12 मूल शिष्यों में से एक रहे सेंट पीटर दुनिया में कैथोलिक धर्म के पहले धर्मगुरु माने जाते हैं। इसके बाद के सभी पोप को सेंट पीटर का उत्तराधिकारी माना जाता है। हालांकि, इसके बावजूद आगे आने वाले किसी भी पोप ने इस पद पर रहने के दौरान सेंट पीटर का नाम पर अपना नाम नहीं रखा। इसकी एक वजह यह है कि कोई भी कैथोलिक धर्मगुरु ईसाई धर्म के पहले पोप से अपनी तुलना नहीं चाहता। दूसरा- प्राचीन समय में यह भविष्यवाणी हुई थी कि जब दुनिया में पीटर नाम से अगले पोप दुनिया के अंत से ठीक पहले आएंगे। 

आखिरकार नया पोप चुने जाने के बाद अंतिम बैलट पेपरों को एक खास तरह का केमिकल मिलाकर जलाया जाता है, जिससे इनसे उठने वाला धुआं सफेद होता है। बाहर नए पोप का इंतजार कर रहे लोग इस सफेद धुएं को देखने के बाद ही निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि नया पोप चुन लिया गया है। 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें