नेपाल में आम चुनाव की तारीख नजदीक आ गई है। राजशाही को त्यागकर लोकशाही को अपनाने वाले पड़ोसी देश में इस बार राजनीतिक स्थिरता मुख्य चुनावी मुद्दा बना है। नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने लोगों को स्थिर सरकार देने का भरोसा दिया है। परंतु, लोगों को उसके वादे पर यकीन नहीं हो रहा। इसका कारण नेपाली कांग्रेस नहीं, बल्कि गठबंधन में शामिल प्रमुख वाममंथी पार्टी सीपीएन (माओइस्ट सेंटर) है।
सीपीएन (एमसी) के प्रमुख पूर्व प्रधानमंत्री पुष्क कमल दहल उर्फ प्रचंड हैं, जो खुलेआम दावा करते हैं कि उन्होंने सरकार बनाने और गिराने में अहम भूमिका निभाई है। हालांकि, इस बार सीपीएन-एमसी ने भी राजनीतिक स्थिरता को प्राथमिकता देने का वादा किया है। नेपाली संसद के निचले सदन 275 सदस्यीय प्रतिनिधिसभा के लिए 20 नवंबर को मतदान होगा।
वैसे तो चुनाव में मैदान में छोटे बड़े कई दल हैं, लेकिन मुख्य मुकाबला नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन और पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल के बीच ही होने का अनुमान है। नेपाली कांग्रेस और वामपंथी नेता ओली को ही मौजूदा राजनीतिक स्थिरता के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं जिन्होंने अल्पमत में आने के बाद सदन को भंग कर दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर संसद बहाल हुई थी।
स्थिर सरकार के वादे के साथ सत्ता में आए थे वामदल
10 साल के उग्रवाद के बाद वामपंथी दल स्थिर सरकार देने के वादे के साथ सत्ता में आए थे। 2008 के पहले चुनाव में वामदलों को बहुमत मिला था और प्रचंड पीएम बने थे, लेकिन वे ठीक से सरकार नहीं चला पाए। उसके बाद से नेपाल ने कई राजनीतिक गठजोड़ और राजनीतिक विलय और अलगाव देखे हैं।
प्रचंड तीसरी बड़ी पार्टी बनने का कर चुके हैं दावा
राजनीति विश्लेषक राजेश गौतम का कहना है कि इस बार भी प्रचंड सरकार को स्थिर रहने देंगे इसकी उम्मीद कम ही है। वह कहते हैं कि प्रचंड का यह दावा कि चुनाव में उनकी पार्टी तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आएगी, राजनीतिक अस्थिरता जारी रहने का संकेत है। किसी भी पार्टी को बहुमत मिलने की संभावना कम है। बता दें कि 275 में 165 सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष और 110 सदस्यों का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से होता है।
त्रिशंकु संसद की तरफ ले जाती है नेपाली चुनावी प्रणाली : यादव
नेपाल के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त अयोधी प्रसाद यादव भी गौतम से सहमति जताते हैं। वह कहते हैं, हम जिस तरह की चुनाव प्रणाली में है वह हमें त्रिशंकु संसद की तरफ ले जाती है।
वामदलों पर त्वरित लाभ की राजनीतिक करने का आरोप
2006 के राजनीतिक बदलाव के बाद से ही प्रचंड और वामपंथी दलों पर त्वरित लाभ की राजनीति करने के आरोप लगते रहे हैं। इसलिए राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं प्रचंड के साथ रहते हुए सत्तारूढ़ गठबंधन का राजनीतिक स्थिरता का वादा संदेहपूर्ण है।