पाकिस्तान की सेना की तरफ से मंगलवार को एक असामान्य बयान जारी किया गया। ये बयान सेना मुख्यालय में हुए फॉर्मेशन कमांडर्स कॉन्फ्रेंस के बाद जारी हुआ। इसमें कहा गया कि देश के राजनीतिक नेतृत्व में भरोसा रखना और संविधान एवं कानून के राज की रक्षा करना सेना का सुविचारित रुख है। कॉन्फ्रेंस में सेना के कॉर्प कमांडर, प्रिंसिपल स्टाफ ऑफिसर और सभी फॉर्मेशन कमांडर शामिल हुए। सम्मेलन की अध्यक्षता सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा ने की।
सेना के जन संपर्क विभाग की तरफ से जारी बयान में कहा गया कि इस सम्मेलन ने कुछ हलकों से पाकिस्तान की सेना को बदनाम करने और सेना और समाज के बीच विभाजन पैदा करने के लिए चलाए जा रहे अभियान पर ध्यान दिया है। पाकिस्तानी मीडिया में छपी रिपोर्टों में ध्यान दिलाया गया है कि इमरान खान के सत्ता से हटने के बाद सोशल मीडिया पर सेना विरोधी भावनाएं बड़े पैमाने पर व्यक्त हुई हैं। ट्विटर पर सेना विरोधी हैशटैग ट्रेंग करते रहे हैं। इसके अलावा इमरान खान के समर्थन में देश भर हुई रैलियों के दौरान सेना विरोधी नारे भी लगाए गए हैं।
जनरल बाजवा ने जिस तरह राजनीतिक रूप से गरम माहौल के बीच पाकिस्तान और अमेरिका के बीच गहरे रिश्तों की बात की थी, उससे इमरान खान समर्थकों में नाराजगी पैदा हुई। गौरतलब है कि इमरान खान ने साफ कहा है कि उनकी सरकार गिराने के पीछे अमेरिका की भूमिका रही।
इमरान खान के समर्थकों का आरोप है कि देश में सरकार बदलने की साजिश विदेश में रची गई। उसे नाकाम करने के बजाय सैन्य नेतृत्व ने उन विपक्षी दलों का साथ दिया, जो उस साजिश का हिस्सा बने हुए थे। सत्ता से बाहर होने के बाद इमरान खान और उनकी पार्टी- पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) लगातार आंदोलन के मूड में हैं। पीटीआई ने अब एलान किया है कि 24 अप्रैल को लाहौर में मीनार-ए-पाकिस्तान के पास विशाल रैली का आयोजन किया जाएगा। वह रैली पाकिस्तान में सरकार बदलने के लिए रची गई विदेशी साजिश के खिलाफ होगी। इसके पहले देश के अलग-अलग शहरों में रैली करने का कार्यक्रम भी घोषित किया गया है। इसके मुताबिक 16 अप्रैल को कराची में एक बड़ी जन सभा का आयोजन होगा।
पीटीआई लगातार नई बनी शाहबाज शरीफ सरकार को ‘आयातित सरकार’ कह रही है। पार्टी की पंजाब शाखा के अध्यक्ष शफाकत महमूद ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि इमरान खान को सत्ता से हटाने के लिए "सारे चोर" इकट्ठे हो गए।
जानकारों ने कहा है कि पाकिस्तान में कभी सेना की सार्वजनिक रूप से वैसी आलोचना नहीं हुई, जैसी इस बार हो रही है। इससे जनमत के एक हिस्से में सेना की भूमिका संदिग्ध हुई है। उधर, सैन्य अधिकारी इस बात से व्यथित हैं कि उन्हें विदेशी षड्यंत्रकारियों का सहयोगी बता कर उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाए जा रहे हैं।