अनवार के अब तक के कारनामे
अनवार की निजी जिंदगी के बारे में पाकिस्तान के पत्रकार भी ज्यादा नहीं जानते, कराची में लंबे समय से रिपोर्टिंग कर रहे बीबीसी उर्दू के रियाज सुहैल कहते हैं, "पुलिस फोर्स में अनवार अपने सहकर्मियों के साथ कम ही मिलते-जुलते थे, यही वजह है कि उनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। वे अकेले ही रहना पसंद करते हैं, कई पुलिस अधिकारी भी उनसे दूरी बनाए रखते हैं क्योंकि उनकी इमेज
कंट्रोवर्शियल है।"
रियाज ये भी बताते हैं कि लोग उनके परिवार के बारे में कुछ नहीं जानते, पाकिस्तान के पुलिस अधिकारी सुरक्षा कारणों से अपने परिवार की जानकारी गुप्त रखते हैं, "कराची के बड़े पुलिस अधिकारी तो अपने परिवार को हर कुछ महीनों पर एहतियातन एक जगह से दूसरी जगह भेजते रहते हैं।" 58 साल के अनवार की हर तस्वीर पुलिस की वर्दी में ही दिखती है, सांवला रंग, औसत कद, कनपटी पर पके बाल, हल्की मूंछों वाले अनवार एक मामूली पुलिसकर्मी ही दिखते हैं कोई बड़े पुलिस अधिकारी नहीं, इसकी वजह भी है।
अनवार असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर से सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते एसएसपी के ओहदे तक पहुंचने वाले पाकिस्तान के अकेले पुलिस अधिकारी हैं, वे फेडरल सर्विस के अधिकारी नहीं हैं, वे एलीट अफसरों की तरह अंगरेजी नहीं बोलते, उर्दू में ही बात करते हैं। बीबीसी उर्दू सेवा के पत्रकार असद चौधरी कहते हैं कि पाकिस्तान में पुलिस की वर्दी की-गहरी नीली कमीज और खाकी पतलून-फौजी वर्दी के सामने कोई इज्जत नहीं है, लेकिन अनवार का रुतबा बिल्कुल अलग था, वे मानो कानून से ऊपर उठ चुके थे। इसकी एक मिसाल ये है कि वे एसएसपी बनने के बाद से वे 74 बार दुबई गए मगर इसके लिए उन्हें किसी तरह के डिपार्टमेंटल पेपरवर्क की जरूरत नहीं पड़ी। ये सवाल भी वाजिब है कि एक लाख रुपये महीना कमाने वाले सरकारी
पुलिस अधिकारी के पास कुछ ही महीनों में 74 बार दुबई जाने के लिए पैसे कहां से आए?
कराची शहर और अनवार साथ-साथ बढ़े
एक दौर था जब कराची की गलियों में मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) की तूती बोलती थी, बिहारी या मुहाजिर कहे जाने वाले उर्दूभाषी नौजवानों को अल्ताफ हुसैन ने संगठित किया था जो पठानों और दूसरे गुटों से हिंसक झड़पों में लगे थे और कराची पर नियंत्रण हासिल करने की कोशिश कर रहे थे।
कराची की सड़कों पर हर रोज बोरियों में बंद लाशें मिलने को आम बात समझा जाने लगा था, कई ऐसे इलाके थे जहां एमक्यूएम का राज चलता था और वहां जाने से पुलिस भी कतराती थी, 1990 के दशक में एक युवा पुलिस अधिकारी ने एनकाउंटरों का सिलसिला शुरू किया, उसका नाम था राव अनवार।
जब मुशर्रफ सत्ता में आए तो उन्होंने एमक्यूएम को सत्ता में शामिल कर लिया, अब अनवार के लिए कराची में जिंदा रह पाना असंभव हो गया क्योंकि उन्होंने एमक्यूएम के बहुत सारे लोगों को मारा था, मुशर्रफ ने अनवार को कुछ समय के लिए दुबई भेज दिया। रियल स्टेट के धंधे में खलल डालने वालों को ठिकाने लगाया। जब माहौल थोड़ा बदला तो वे पुलिस की नौकरी में आए, लेकिन सिंध में नहीं, बल्कि
बलूचिस्तान में क्योंकि उन्हें कराची या सिंध के दूसरे इलाके में तैनात करना असुरक्षित माना गया, 2008 में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी उनको एक बार फिर कराची ले आई और उन्हें मलीर इलाके का एसपी बना दिया गया।
2008 से 2018 के बीच दस सालों में अनवार का कद और रौब बढ़ता ही गया। वरिष्ठ पत्रकार असद चौधरी बताते हैं, "मलीर एक नदी है, उसके पास बहुत बड़ी खाली जमीन थी, वहां एक्सप्रेस वे बनाया गया, जमीन डेवलप हुई और देखते-देखते पॉश बहरिया टाउन में अरबों रुपये का रियल स्टेट तैयार हो गया, कंस्ट्रक्शन का काम चलने लगा, नदी से रेत निकाली जाने लगी, माफिया खड़े होने लगे और मलीर के एसपी ने अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया।" कुछ साल पहले उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा था, "मैंने पिछले कुछ समय में मलीर में 150 से ज्यादा एनकाउंटर किए हैं और मैं यहां तैनात रहा तो एनकाउंटरों की तादाद बढ़ेगी ही। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने अपनी बहादुरी के कई किस्से सुनाए थे और बताया था कि किस तरह उन्होंने पहला एनकाउंटर एमक्यूएम के फहीम कमांडो का किया था।"
अनवार के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने बड़े नेताओं और फौजी अफसरों की लगातार मदद की और उनके रियल स्टेट के धंधे में खलल डालने वालों को ठिकाने लगाया, पुलिस में उन्हें चाहने वालों की तादाद कम ही है। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा था, "अनवार के हाथों या उनकी निगरानी में बहुत सारे लोग मारे गए हैं, इसका खामियाजा पुलिस वालों को भुगतना पड़ा है, बड़ी संख्या में पुलिस के लोग बदले की कार्रवाई में मारे गए हैं।"
असद चौधरी बताते हैं कि कई बार मारे गए पुलिसवालों की लाशों के पास पर्ची मिली है जिसमें लिखा गया है कि यह उनके रिश्तेदार की फर्जी मुठभेड़ में हुई मौत का बदला है। अब अदालत ने कहा है कि अनवार के मामले में पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता से अदालती प्रक्रिया अपना काम करेगी, लेकिन पाकिस्तानी
प्रेस ये सवाल पूछ रहा है कि इतने दिनों तक नियम-कानून कहां थे, और क्या कर रहे थे?