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ओली कैबिनेट के मनमाने फैसले पर सत्ताधारी पार्टी में बढ़ी तकरार

Tue, 21 Apr 2020 09:16 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू

सार

  • प्रचंड गुट ने उठाए सवाल, आखिर बगैर सहमति बनाए कैसे पास हुए दो अध्यादेश
  • कैबिनेट ने पास किए दो विधेयक, राजनीतिक दलों में टूट के नियमों में दी ढील
  • प्रचंड ने बुलाई पार्टी की आपात बैठक, नहीं बन पाई कोई सहमति
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KP sharma OLI and Pushp Kamal Dahal - फोटो : सांकेतिक
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विस्तार
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क्या नेपाल की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी में एक बार फिर दरार पड़ गई है? क्या प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली मनमाने फैसले ले रहे हैं? सरकार ने आखिर क्यों गुपचुप तरीके से दो अध्यादेश पास करके राष्ट्रपति से मंजूरी भी ले ली और सत्ता में बराबर के भागीदार पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ समेत उनके गुट के किसी नेता को पता तक नहीं चला?

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न ही इन अध्यादेशों को लाने से पहले पार्टी फोरम में आपसी सहमति ही बनाई गई। इस सवाल पर बुलाई गई नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के केंद्रीय सचिवालय की बैठक बेनतीजा खत्म हो गई।

ये आपात बैठक पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष पुष्प कमल दहल ने बुलाई थी। कैबिनेट की ओर से इन दोनों अध्यादेशों को अंतिम रूप देने के फैसले की जानकारी ओली के कुछ मंत्रियों ने प्रचंड के घर जाकर दी।
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प्रचंड गुट ने बगैर उन्हें भरोसे में लिए दोनों अध्यादेश पास कराने के फैसले से खासा नाराज दिखा और प्रचंड ने दो घंटे के भीतर पार्टी की आपात बैठक बुला ली। इस बात से प्रचंड गुट को और झटका लगा कि ओली कैबिनेट के इस फैसले पर राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने अपनी मुहर भी लगा दी है।

दरअसल इन अध्यादेशों में से एक राजनीतिक पार्टी कानून में बदलाव है, जिसके तहत किसी भी पार्टी से अलग होना और नया गुट बना लेना और आसान हो गया है। दूसरे अध्यादेश के तहत अब संवैधानिक काउंसिल की बैठक बगैर मुख्य विपक्षी पार्टी की भागीदारी के भी बुलाई जा सकती है।

संवैधानिक काउंसिल के अध्यक्ष प्रधानमंत्री खुद होते हैं और इसमें संवैधानिक नियुक्तियों के फैसले लिए जाते हैं।

सूत्रों का कहना है कि बैठक में दहल ने सरकार के इस फैसले पर नाराजगी दिखाई, जबकि ओली ने इसे सही ठहराया। पार्टी की ओर से जारी एक बयान में एनसीपी प्रवक्ता नारायण काजी श्रेष्ठा ने बताया कि पार्टी सचिवालय की बैठक में दोनों अध्यादेशों को लेकर चर्चा हुई और प्रधानमंत्री ओली ने इसकी अहमियत समझाने की कोशिश की।

हालांकि श्रेष्ठा ने ये भी कहा कि बैठक के बीच में ही ये बताया गया कि अध्यादेशों को राष्ट्रपति भंडारी की मंजूरी भी मिल चुकी है।

माना जा रहा है कि ऐसे वक्त में जब देश कोरोना वायरस के खतरे से जूझ रहा है, सरकार के ऐसे फैसले इस मुहिम पर असर डाल सकते हैं। खासकर किसी भी ऐसे मुद्दे को लेकर जिसमें पार्टी के अहम नेताओं के बीच आपसी सहमति न हो और पार्टी में ही अविश्वास के आसार दिखने लगें।

हालांकि माना जा रहा है कि राजनीतिक पार्टियों के विभाजन के नियमों में ढील देकर सरकार ने एनसीपी के असंतुष्ट धड़ों के लिए भी रास्ता आसान कर दिया है।

जबकि ओली गुट का मानना है कि राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल समेत कई विरोधी पार्टियों और मधेसियों की पार्टी के भीतर तमाम असंतुष्ट गुट हैं जो पार्टी से बाहर आना चाहते हैं, लेकिन कड़े नियमों की वजह से ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, ऐसे में ये कानून उनके लिए मददगार साबित होगा। जबकि एक तबका ये भी मानता है कि इससे राजनीतिक दलों को तोड़ने और सांसदों की खरीद फरोख्त को बढ़ावा मिलेगा।
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इसे लेकर एनसीपी में उठ रहे विरोध के स्वर को नेपाल की राजनीति में आने वाले तूफान का संकेत भी माना जा रहा है।

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