विश्व कपास दिवस के मौके पर न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में भारत और माली के स्थायी मिशनों ने मिलकर 'कॉटन फॉर सस्टेनेबिलिटी: लाइवलीहुड्स, वैल्यू एडिशन एंड पार्टनरशिप' यानी 'टिकाऊ विकास के लिए कपास: आजीविका, मूल्य संवर्धन और साझेदारी' विषय पर कार्यक्रम का आयोजन किया। कार्यक्रम में कपास को सिर्फ खेती और कारोबार की फसल के बजाय लोगों की आजीविका, टिकाऊ विकास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जोड़कर देखने पर जोर दिया गया।
कई देशों के राजनयिक एक मंच पर जुटे
कार्यक्रम में कोट द'ईवोआर, उज्बेकिस्तान, चाड, नीदरलैंड्स, इटली, बुर्किना फासो, मिस्र, कैमरून और पेरू के स्थायी प्रतिनिधि और उप स्थायी प्रतिनिधि शामिल हुए। इनके अलावा बड़ी संख्या में राजनयिक समुदाय के सदस्य भी मौजूद रहे। भारत के वस्त्र मंत्रालय, संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) और इंटरनेशनल कॉटन एडवाइजरी कमेटी यानी अंतरराष्ट्रीय कपास सलाहकार समिति के प्रतिनिधियों ने भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया।
सांसदों ने साझा किए अपने राज्यों के अनुभव
संयुक्त राष्ट्र के दौरे पर संसदीय परिचय कार्यक्रम के तहत पहुंचे लोकसभा सांसद असित कुमार मल, एल. के. सुधीश और लवली आनंद ने अपने-अपने राज्यों के अनुभव साझा किए। संसदीय प्रतिनिधिमंडल के अन्य सदस्यों ने भी चर्चा में सक्रिय भागीदारी की और कपास तथा उससे जुड़े क्षेत्रों को लेकर अपने विचार रखे।
कपास से रोजगार से लेकर सतत विकास लक्ष्यों तक की चर्चा
कार्यक्रम में इस बात पर खास चर्चा हुई कि कपास किस तरह लोगों की आजीविका मजबूत करने के साथ संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को हासिल करने में मदद कर सकता है। बातचीत में कपास की बेहतर कीमत और बाजार तक पहुंच, उत्पादन को ज्यादा टिकाऊ बनाने, कपास से जुड़े उत्पादों में वैल्यू एडिशन यानी मूल्य संवर्धन, महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और अलग-अलग देशों के बीच साझेदारी बढ़ाने जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
वैल्यू चेन को मजबूत करने की जरूरत
वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि कपास को केवल कच्चे माल के रूप में देखने के बजाय उसके उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण, कारीगरी, तैयार उत्पाद और बाजार तक की पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करने की जरूरत है। इससे किसानों, कारीगरों, महिलाओं और छोटे उद्यमियों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
कपड़े पर उभरी भारत की सदियों पुरानी कला
कार्यक्रम में भारत की समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा की झलक भी देखने को मिली। प्रतिभागियों को एक मास्टर कारीगर के मार्गदर्शन में कलमकारी को करीब से समझने और इसे हाथों से आजमाने का मौका मिला। इस अनुभव ने कपास को खेत से लेकर कला और तैयार उत्पाद तक पहुंचाने वाली भारत की लंबी और समृद्ध परंपरा को भी सामने रखा। कलमकारी जैसी पारंपरिक कला यह दिखाती है कि कपास केवल कृषि उपज नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी कारीगरी स्थानीय संस्कृति, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण आधार है।
महिलाओं की भागीदारी और आर्थिक सशक्तीकरण पर जोर
कार्यक्रम में कपास आधारित गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी और उनके आर्थिक सशक्तीकरण को भी महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में सामने रखा गया। कपास की खेती, प्रसंस्करण, हस्तशिल्प और वस्त्र निर्माण से जुड़े क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका को मजबूत करके स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं।
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अंतरराष्ट्रीय साझेदारी से टिकाऊ विकास की राह
कार्यक्रम में अलग-अलग देशों के अनुभवों और विशेषज्ञता को साझा करने की जरूरत पर भी जोर दिया गया। प्रतिभागियों ने माना कि कपास क्षेत्र में टिकाऊ उत्पादन, बेहतर बाजार पहुंच, तकनीकी सहयोग, मूल्य संवर्धन और किसानों तथा कारीगरों की आय बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारी अहम भूमिका निभा सकती है। विश्व कपास दिवस के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम ने कपास को खेती से आगे आजीविका, कारीगरी, महिला सशक्तीकरण, टिकाऊ विकास और वैश्विक सहयोग से जोड़ने का संदेश दिया।