पाकिस्तान के स्वात घाटी इलाक़े में महिलाओं ने महिला जिरगा का गठन कर इतिहास रच दिया है। मगर इसी के साथ ताक़तवर लोग जिरगा के दुश्मन भी बन गए हैं। महिलाओं के इस फ़ोरम में उन मुद्दों पर सुनवाई होती है, जिन पर पुरुषों का एकाधिकार समझा जाता था।
बीबीसी संवाददाता ओरला ग्यूरिन की यह रिपोर्ट कुछ लोगों को परेशान भी कर सकती है।
जीते जी ताहिरा को इंसाफ़ नहीं मिला। एक मोबाइल वीडियो के ज़रिए मौत के बाद इंसाफ़ के लिए उनकी लड़ाई जारी है। पिछले साल अपनी मौत से पहले ताहिरा ने एक बयान रिकॉर्ड कराया था ताकि उसे कोर्ट में इस्तेमाल किया जा सके।
किशोरावस्था में ब्याही और फिर मां बनी ताहिरा ने वीडियो में खुद पर ज़ुल्म करने वालों के नाम लिए थे और कहा था कि उन्हें भी ऐसे ही जलाया जाए जैसे उसे जलाया गया है।
इंसाफ़ की आवाज़
एक तेज़ाब हमले में ताहिरा 35 प्रतिशत तक झुलस गईं थीं। बमुश्किल ताहिरा कुछ बोल पा रहीं थी। उनके जले हुए बदन की हड्डियां माँस छोड़ रहीं थी, पर फिर भी वह अपना बयान दर्ज कराने के लिए प्रतिबद्ध थीं, ताकि उनके गुनहगारों को सज़ा मिल सके।
सफेद रुमाल से आंसू पोंछते हुए उनकी मां जान बानो कहती हैं, "मैंने उससे कहा कि तुम बोलो और बताओ कि तुम्हारे साथ क्या हुआ। अंतिम सांस तक उसने ख़ुद पर हुए ज़ुल्म को बयान किया।"
ताहिरा के पति, ससुर और सास को इसी महीने उन पर तेज़ाब से हमला करने के आरोप से बरी कर दिया गया है। उनकी मां अब इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करने की तैयारी कर रही हैं।
इसमें पाकिस्तान में हाल ही में शुरू हुई पहली महिला जिरगा उनकी मदद कर रही है।
परंपरागत लेकिन विवादस्पद जिरगा व्यवस्था में समाज के बुज़ुर्ग इकट्ठे होते हैं और विवादित मामलों का निपटारा करते हैं। अब तक समानांतर चलने वाली इस न्याय प्रणाली पर पुरुषों का ही एकाधिकार था।
अब 25 महिला सदस्यों की जिरगा अपने ढंग से न्याय देने की तैयारी कर रही है। इसका गठन ख़ूबसूरत लेकिन रुढ़िवादी स्वात घाटी में हुआ है। अब तक इस इलाके पर पाकिस्तानी तालिबान का नियंत्रण था।
अन्याय के खिलाफ़ जंग
एक अव्यवस्थित कमरे में चल रही इस जिरगा की बैठक में हम भी शामिल हुए। महिलाएं इकट्ठी हुईं और फर्श पर गोल घेरा बनाकर बैठ गईं। कई के बच्चे उनके पैरों के पास बैठे थे। ज्यादातर के सिर ढके थे और कुछ बुरक़ा पहने थीं।
क़रीब एक घंटे तक उन्होंने ज़मीन संबंधित विवाद, जल आपूर्ति में दिक्कतों, तनख्वाह न मिलने और क़त्ल जैसे मामलों पर चर्चा की। कमरे में सिर्फ एक ही पुरुष, सुल्तान अहमद मौजूद थे जो स्थानीय वकील हैं और जिरगा सदस्यों को सलाह दे रहे थे। वे जिरगा सदस्य जान बानो का प्रतिनिधित्व भी कर रहे थे।
उन्होंने कहा, "तुम्हारे मामले में पुलिस अपराधी है। वही सबसे बड़े दुश्मन भी हैं।" उनका कहना था कि पुलिस वाले आरोपियों से रिश्वत लेते हैं और फिर जांच करने में आनाकानी करते हैं।
महिलाओं की यह जिरगा इतिहास रच रही है पर इस प्रक्रिया में उसके कई दुश्मन भी खड़े हो गए हैं। स्वात में भी पुरुष ही बेटियों की शादी, पढ़ाई, बाहर जाने न जाने संबंधी तमाम अहम फ़ैसले लेते हैं।
महिलाओं के शोषण के लिए इस बात को भी ज़िम्मेदार माना जाता है। ताहिरा की शादी सिर्फ़ 12 साल की उम्र में एक अधेड़ व्यक्ति से कर दी गई थी।
जान का डर
जिरगा की संस्थापक तबस्सुम अदनान कहती हैं, "हमारे समाज में पुरुषों का प्रभुत्व है और वे महिलाओं को गुलामों की तरह समझते हैं। वे उन्हें उनके अधिकार नहीं देते और अपनी निजी जागीर समझते हैं। हमारा समाज हमें अपने तरीके से जीने का हक़ नहीं देता।"
समाज सेविका और चार बच्चों की मां तबस्सुम अदनान जानती हैं कि रूढ़िवादी व्यवस्था को चुनौती देने के ख़तरे भी हैं। वे कहती हैं, "हो सकता है मेरा क़त्ल कर दिया जाए। मेरे साथ कुछ भी हो सकता है लेकिन मुझे लड़ाई जारी रखनी है। मैं अब रुकने वाली नहीं हूं।"
हम उनके आंगन में बैठकर बात कर ही रहे थे कि उन्हें एक फ़ोन कॉल आई, जिससे वे परेशान हो गईं। वे बताती हैं, "एक और लड़की का शव मिला है। उसके पति ने उसे गोली मारी है।"
तबस्सुम इस मामले में जांच करने और अधिकारियों पर दबाव बनाने की तैयारी कर रही हैं। वे कहती हैं, "हमारी जिरगा से पहले पुलिस और प्रशासन महिलाओं को नज़रअंदाज़ करता था लेकिन अब जिरगा महिलाओं के लिए बहुत कुछ कर रही है।"
दर्द
पास ही एक बुनी हुई चारपाई पर बैठी शोकाकुल मां ताजमहल भी तबस्सुम की बात से इत्तेफाक रखती हैं। उनकी बेटी नुरीना की मई में प्रताड़ना के बाद हत्या कर दी गई थी।
उस घटना को याद करते हुए उन्होंने बताया, "उन्होंने तीन जगह से उसकी बाँह तोड़ दी और फिर गला घोटकर मार डाला। उन्होंने उसकी हंसली की हड्डी भी तोड़ दी थी। उसका मुँह बंद कर दिया गया था। मेरी बेटी का सिर्फ चेहरा ही बचा था। बाकी सिर्फ माँस और टूटी हुई हड्डियां थीं।"
स्थिर आवाज़ में वह अपनी बेटी पर ज़ुल्म की दास्तान सुना रहीं थी। दर्द उनके चारों और शॉल की तरह लिपटा था।
"जब मैंने उसे देखा तो ऐसा लगा, जैसे मेरे कलेजे का टुकड़ा किसी ने निकाल लिया हो। मैं पत्थर हो गई थी। अब भी अपनी आँखों के सामने मुझे उसका चेहरा दिखता है, मैं उसे बहुत याद करती हूँ।"
अब नुरीना के पति और उसके परिवार वालों को हत्या का आरोपी बनाया गया है। ताजमहल बताती हैं कि शुरू में अदालत ने भी इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं ली।
वे कहती हैं, "जब भी हम जज के सामने दर्ख़्वास्त लेकर जाते, वे उसे फाड़कर फेंक देते और हमें बाहर निकाल देते। अब जिरगा की वजह से हमारी आवाज़ भी सुनी जा रही है। अब हमें भी न्याय मिलेगा। जिरगा से पहले मर्द जो चाहते थे अपनी बीवियों के साथ करते थे।"
स्वात के सबसे बड़े शहर मिंगोरा की सड़कों पर महिलाएं न दिखाई देती हैं और न उनकी आवाज़ सुनाई देती है। दवाएं और हार्डवेयर का सामान बेचती छोटी-छोटी दुकानों के आगे टैक्सी और रिक्शेवाले गुज़रते दिखते हैं। ठेलों पर आम बिक रहे हैं और मिठाइयां बन रही हैं लेकिन ज़्यादातर खरीदार पुरुष ही हैं।
हमने स्थानीय पुरुषों से महिला जिरगा के बारे में उनकी राय जानी तो उनके जवाब हैरतअंगेज़ थे। ज्यादातर पुरुष महिलाओं के समर्थन में थे।
एक फल विक्रेता ने कहा, "यह अच्छी बात है। महिलाओं को भी पुरुषों की तरह अपने अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए और उन्हें उनके अधिकार मिलने भी चाहिए।"
एक अन्य व्यक्ति ने कहा, "जिरगा अच्छी है क्योंकि अब अपने हक़ की लड़ाई लड़ने के लिए महिलाओं के पास भी एक ज़रिया है।"
हालांकि पुरुषों की जिरगा के सदस्यों की इस बारे में राय जुदा थी। वे महिला जिरगा को नकारते हुए कहते हैं कि उनके पास अपने फ़ैसले लागू करवाने की ताक़त नहीं है।
'जिरगा ग़ैरक़ानूनी हैं'
पाकिस्तान की प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता ताहिरा अबदुल्ला भी उनकी राय से इत्तेफ़ाक़ रखती हैं। वे कहती हैं, "मैं इसे नौटंकी से ज़्यादा कुछ नहीं समझती। इन महिलाओं की सुनेगा कौन? वो पुरुष, जिनके हाथ में एके-47 है? वो तालिबान, जो महिला विरोधी हैं? या हमारी पितृसत्तात्मक संस्कृति?"
अब्दुल्ला चाहती हैं कि जिरगा पर प्रतिबंध लगना चाहिए चाहे वे पुरुषों की हो या महिलाओं की।
वे कहती हैं, "जिरगा व्यवस्था पूरी तरह ग़ैरक़ानूनी है और इसे पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने भी अवैध ठहराया है। यह कभी न्यायपूर्ण हो ही नहीं सकता। ऐसे कई मामले हमारे सामने हैं, जो साबित करते हैं कि जिरगा से न महिलाओं को न्याय मिलता है और न गैर-मुस्लिमों को।"
ऐसा ही एक मामला पिछले साल पाकिस्तान के उत्तरी इलाके में सामने आया था। तब एक जिरगा ने पांच युवतियों और दो पुरुषों को क़त्ल का फ़रमान सुनाया था। इन पर एक शादी समारोह में साथ में नाच-गाना करके संस्कृति को ध्वस्त करने का आरोप लगा था।
विवादों के निपटारे के लिए परिवार की बेटियों और महिलाओं को दूसरे परिवारों को सौंपने के जिरगा के विवादित फ़ैसले भी अक्सर सामने आते रहते हैं।
लेकिन जान बानो जैसी कुछ महिलाओं के लिए जिरगा नई उम्मीद लेकर आई है। वो हर दिन पहाड़ चढ़कर ताहिरा की क़ब्र पर जाती हैं और उस बेटी के लिए इंसाफ़ की दुआ करती हैं, जिसकी आवाज़ अभी तक सुनी नहीं गई है। उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग को अदालत में चलाया भी नहीं गया था।