पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के मुख्य स्थलों पर लगे बैनर और पोस्टर किसी राजनीतिक अभियान के तहत लगाए जाने वाले ऐसे पोस्टरों-बैनरों का एहसास दिलाते हैं।
हालांकि यहां अभी कोई चुनाव नहीं हो रहे हैं, इन बैनरों में किसी राजनीतिक दल की तारीफ़ भी नहीं है, उन बैनरों पर छपे चेहरे भी किसी नेता के नहीं हैं बल्कि उन पर पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख रहे लेफ़्टिनेंट जनरल ज़हीरुल इस्लाम की तस्वीरें छपी हैं।
इन बैनर पर लिखे संदेश कहते हैं, "हम पाकिस्तान की सेना और आईएसआई को प्यार करते हैं और उनको बदनाम करने की कोशिशों की निंदा करते हैं।"
टीवी एंकर हामिद मीर पर हमला
यह काफ़ी विचित्र लग सकता है, लेकिन यह अभियान पाकिस्तान के सबसे बड़े मीडिया समूह जंग ग्रुप के ताज़ा आरोपों के बाद शुरू हुआ कि समूह के चैनल जियो टीवी के एंकर हामिद मीर पर हमले में आईएसआई का हाथ हो सकता है।
जियो टीवी के एंकर हामिद मीर कराची में 19 अप्रैल को उन पर हुई गोलीबारी में घायल हो गए थे, उनका अभी अस्पताल में इलाज चल रहा है।
हमले के थोड़ी देर बाद उनके भाई आमिर मीर, जो खुद भी एक पत्रकार हैं, ने एक बयान जारी करके कहा था कि हामिद ने पहले भी आशंका ज़ाहिर की थी कि आईएसआई उनको मारने की कोशिश कर सकती है।
जियो टीवी ने इस बयान को कुछ घंटों तक जनरल इस्लाम की तस्वीर के साथ दिखाया था। टीवी के इस क़दम को कई लोगों ने जनरल या आईएसआई पर आरोप साबित होने से पहले उन्हें दोषी ठहराने के रूप में देखा।
आईएसआई की भूमिका चर्चा का विषय
यह भी अप्रत्याशित था। हालांकि हाल के वर्षों में आईएसआई की भूमिका लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी है, लेकिन कभी भी सीधे तौर पर कुछ ग़लत करने का आरोप नहीं लगा था।
लेकिन इस परेशान करने वाले घटनाक्रम का परिणाम कुछ-कुछ ऐसा आभास देता है जैसा पहले भी हुआ है। विभिन्न समूहों का सेना और आईएसआई के प्रति गलियों में प्रेम का इज़हार करने का तरीका काफ़ी कुछ वैसा ही है जब पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद इन दो संस्थाओं का बचाव किया जा रहा था।
बाद में उसी साल के अंत में नेटो का सप्लाई रूट दोबारा खोलने के ख़िलाफ़ एक ज़ोरदार अभियान चलाया गया था। इस रास्ते को पाकिस्तान सरकार ने अपनी सीमा सुरक्षा चौकी पर अमरीका के एक हवाई हमले के बाद बंद कर दिया था।
यह पहला मौका नहीं है जब जियो टीवी चैनल पर इस तरह के आरोप लगे हैं। बहुत से लोग चैनल की इस प्रवृत्ति को सार्वजनिक हस्तियों के 'मीडिया ट्रायल' की संज्ञा देते हैं।
पिछले पांच सालों में, जियो पर कथित तौर पर पूर्व राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की भ्रष्ट छवि गढ़ने के आरोप लगे थे, हालांकि इनमें से किसी को भी न्यायालय की ओर से दोषी नहीं ठहराया गया था।
आईएसआई पर हमले का शक
इस चलन का काफ़ी संक्रामक असर हुआ और प्रतिस्पर्धी टेलीविजन चैनलों ने पब्लिक रेटिंग और आय के लिए होड़ के इस चलन को अपनाया। कई लोगों को संदेह है कि आईएसआई जानबूझकर इस होड़ का समर्थन करती रही है। कई बार तो कुछ एंकरों को आईएसआई कुछ सूचनाएं भी देती रही है ताकि पाकिस्तान सरकार पर दबाव बनाया जा सके।
कई लोग कहते हैं कि आईएसआई और जियो टीवी 'ज़्यादा ही आगे' बढ़ गए थे। जियो टीवी ने आईएसआई का 'मीडिया ट्रायल' करने की कोशिश की और बदले में प्रतिस्पर्धी चैनलों द्वारा व्यावसायिक हितों को साधने के लिए उस पर विदेशी ताक़तों का एजेंट होने का आरोप लगाया गया।
वहीं यह पहला मौका नहीं है जब आईएसआई पर किसी पत्रकार पर हमला करने का संदेह जताया गया है। 2006 के बाद से विभिन्न मामलों में इस पर पत्रकारों को डराने, धमकाने, अपहरण और यहां तक हत्या करने के आरोप लगे।
पोस्टरों में सेना प्रमुख की तस्वीरें
इस्लामाबाद में लगे पोस्टरों में सेना प्रमुख राहिल शरीफ़ की तस्वीरें भी इस्तेमाल की गई हैं। पाकिस्तान में आईएसआई को देश के सुरक्षा परिदृश्य को आकार देने और अपनी कार्रवाइयों के समर्थन के लिए सामाजिक विमर्श तैयार करने के लिए जाना जाता है।
चरमपंथी समूहों के ध्रुवीकरण और उनके विभिन्न राजनीतिक धड़ों की ओर से समय-समय पर गलियों में होने वाले प्रदर्शनों को इस स्वायत्तता की उपज बताया जाता है।
1990 के दौरान ख़ुफ़िया विभाग उर्दू भाषा के प्रेस के माध्यम से अपनी बात लोगों तक पहुंचाता था। आज उनको सीधे तौर पर टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाली सामग्री को प्रभावित करने के लिए जाना जाता है।
पाकिस्तान के विभिन्न चैनलों के टॉक-शो को प्रस्तुत करने वालों कई बार ने निजी तौर पर स्वीकार किया है कि कैसे अक्सर आईएसआई के अधिकारी प्रोड्यूसरों और एंकरों को कार्यक्रमों का आइडिया देते हैं, टॉक शो के विषय का सुझाव देते हैं और बहस को प्रभावित करने के लिए सेवानिवृत्त लोगों और पत्रकारों को आगे बढ़ाते हैं।
ख़ुफ़िया संस्थाएं और प्रमुख मीडिया समूह दोनों सामाजिक स्तर पर रुढ़िवादी नज़रिया अपनाते दिखाई देते हैं। दोनों ही चरमपंथी धार्मिक समूहों और लड़ाकों को ज़रूरत से ज़्यादा तवज्जो देते हैं।
2007 में शुरू हुआ आंदोलन
लेकिन इसमें मतभेद की शुरुआत 2007 में वकीलों के आंदोलन के बाद हुई थी। इस आंदोलन के कारण परवेज़ मुशर्रफ़ की सैन्य सरकार को देश के मुख्य न्यायाधीश को उनके पद पर फिर से बहाल करना पड़ा था, जिनको कुछ महीने पहले उनके पद से हटा दिया गया था।
इस लड़ाई का एक बड़ा हिस्सा टेलीविजन स्क्रीन पर लड़ा गया था, जिसमें पत्रकार समुदाय उस समय के सैन्य शासक के ख़िलाफ़ था। तब से मीडिया की ताक़त काफ़ी बढ़ी है और इसने पारंपरिक रूप से आईएसआई का विशिष्ट क्षेत्र माने जाने वाले मामलों में दख़ल देना शुरू कर दिया।
प्राइम टाइम के दौरान सबसे ज़्यादा देखा जाने वाला शो हामिद मीर का 'कैपिटल टॉक' बलूचिस्तान में सेना की भूमिका की तीखी आलोचना के साथ सामने आया था।
लगातार लगते रहे आरोप
स्थानीय लोगों ने आईएसआई और इसकी प्रतिनिधि संस्थाओं पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अपहरण और कभी-कभी अलगाववादियों के साथ संपर्क के शक में हत्या तक करने का आरोप लगाया।
हामिद मीर ने भी सेना के ख़िलाफ़ अपने विचारों को रखा जैसे परवेज़ मुशर्ऱफ़ के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मामला चलाया जाना चाहिए या नहीं।
हालांकि पाकिस्तान की सरकार मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मामला चलाने के मामले में काफ़ी आगे बढ़ गई है, लेकिन वर्तमान सेनाध्यक्ष ने कहा कि वह 'सेना की गरिमा बचाने' की पूरी कोशिश करेंगे।
पत्रकार हामिद मीर पर हुए हमले को सेना, नेताओं और मीडिया के बीच होने वाले तीन तरफ़ा संघर्ष के रूप में देखा जा रहा है।