'कितने आदमी थे'... बॉलीवुड के सबसे मशहूर (या कुख्यात) खलनायकों में से एक गब्बर सिंह सन्नाटे को चीरते हुए अपनी खास अदा में पूछता है।
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'सरदार दो आदमी थे', थिएटर की पीछे की सीटों में से महिला हंसते हुए, कालिया के संवाद बोलने से पहले ही बोल पड़ती हैं। लेकिन ऐसा सिर्फ एक बार नहीं होता। दर्शक 204 मिनट लंबी फिल्म के दौरान लगातार संवादों, स्थितियों और गानों पर हंसी-मजाक और टिप्पणी करते रहते हैं। बहुत से लोगों के अनुसार 1975 की ब्लॉकबस्टर फिल्म शोले का यही असली जादू है, जो बॉलीवुड की दुनिया भर में सबसे ज्यादा देखी गई फिल्म मानी जाती है।
इस्लामाबाद के सेंट्रॉस सिनेप्लेक्स में एक दर्शक ने कहा, "लोग इसका ड्रामा या रहस्य देखने नहीं आते- सबने कम से कम एक बार इसे देखा हुआ है- बल्कि इसलिए आते हैं कि इसकी उत्तेजना कभी खत्म नहीं होती।"
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यह फिल्म पाकिस्तान के थिएटरों में 17 अप्रैल को रिलीज हुई, भारत और दुनिया के हिंदू-उर्दू बोलने वाले लोगों पर जादू करने के 40 साल बाद। शोले के पाकिस्तान में वितरण अधिकार रखने वाली कंपनी मंडवीवाला एंटरटेनमेंट के निदेशक आमिर हैदर कहते हैं कि यह फिल्म पुरानी नहीं पड़ी।
वह कहते हैं, "रिलीज के पहले हफ्ते में इसने 45 लाख रुपये (करीब 28,12,140 भारतीय रुपये) की कमाई की, जिसकी तुलना में पीके जैसी नई फिल्म ने दस गुना कमाए। लेकिन फिर भी यह काफी है अगर आप इसके साथ एक क्लासिक फिल्म के वितरण की साख को भी जोड़ें तो।"
तगड़ी कमाई कर रही है फिल्म
मंडवीवाला एंटरटेनमेंट के निदेशक आमिर हैदर कहते हैं, 'दरअसल, शोले ने अब तक पाकिस्तान में दिखाई गई किसी भी 10 साल पुरानी फिल्म से ज्यादा कमाई की है। उदाहरण के लिए 2002 की क्लासिक देवदास से अच्छा व्यापार किया है जो यहां बहुत बड़ी हिट साबित हुई थी। उसमें शाहरुख खान थे जो युवाओं में लोकप्रिय हैं।'
तो शोले के स्थाई आकर्षण की वजह क्या है? यह एक सामान्य सी अच्छाई-बुराई की लड़ाई की कहानी है जो एक काल्पनिक गांव रामगढ़ में घटती है। जिसका शायद सबसे जानदार किरदार, एक निर्दयी, सनकी डाकू गब्बर सिंह है।
इसके अलावा कहानी दो छोटे चोरों की बहादुरी की कहानी है जो पूर्व जेलर और रामगढ़ के जमींदार ठाकुर बलदेव सिंह के साथ मिलकर गब्बर को मारते हैं। बहुत से लोग इसे 60 के दशक की पश्चिमी फिल्मों से प्रेरित बताते हैं लेकिन शोले आश्चर्यजनक रूप से स्थितियों, किरदारों के भारतीयकरण में सफल रही है।
खड़ीबोली में लिखे गए इसके संवादों को अभिनेताओं ने अपनी खास अदा के साथ प्रस्तुत कर उन्हें यादगार बना दिया है।
इसकी पटकथा ने अभिनेताओं के शानदार काम की गुंजाइश पैदा की। आज देखने पर यह एक कई स्टार अभिनेताओं वाली फिल्म लगती है लेकिन तब अमिताभ बच्चन उभरते हुए स्टार थे और अमजद खान अपनी पारी शुरू कर रहे थे। हालांकि यह एक महत्वाकांक्षी परियोजना थी जिसे 70एमएम सिनेमास्कोप में शूट किया गया थ। ऐसे वक्त में जब कंप्यूटर से बनने वाले दृश्य मौजूद नहीं थे तब इसमें बॉलीवुड के सबसे शानदार सिनेमेटोग्राफी नजर आती है।
1965 की जंग से भारतीय फिल्मों पर लगा था बैन
पाकिस्तानी दर्शकों से शोले का पहला परिचय दृश्य नहीं बल्कि 120 मिनट की ऑडियो टेप के जरिए हुआ था जो खाड़ी देशों में काम करने वाले दोस्तों या रिश्तेदारों के जरिए आती थीं।
वीडियो कैसेट रिकॉर्डर (वीसीआर) के आने के बाद वीडियो प्रिंट भी मिलने लगे, लेकिन वह पाएरेटेड प्रिंट थे। पाकिस्तान ने 1965 की जंग के बाद भारतीय फिल्मों पर प्रतिबंध लगा दिया था और यह अब भी भारत से आयात किए जाने वाले सामान की पाकिस्तानी सूची से बाहर हैं।
लेकिन 2006 से यह नीति कुछ उदार हुई है जब तत्कालीनी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने मंडवीवाला एंटरटेनमेंट को 1960 की ऐतिहासिक कथानक वाली फिल्म मुगल-ए-आजम को दिखाने का इंतजाम करने को कहा।
आमिर हैदर कहते हैं, "पहले दिन वह धराशाई हो गई और हफ्ते के अंत में जब तक हमने उसे उतारा ऐसा ही रहा।" 'इसकी बहुत सारी वजह थीं। वक्त बहुत बदल चुका था। दिलीप कुमार या मधुबाला को उस कदर कोई नहीं जानता था जिस कदर उनकी पीढ़ी के लोग जानते थे।" इसलिए हाल ही में जब मंडवीवाला एंटरटेनमेंट ने शोले को आयात करने का प्रस्ताव दिया तो हैदर को हिचक हो रही थी।
वह बताते हैं, "मैंने कहा कि आज कोई भी धर्मेंद्र को नहीं जानता। संजीव कुमार मर चुके हैं और अमजद खान भी। आज की पीढ़ी हेमा मालिनी को बागबान की सीधी-सादी सास के रूप में जानती है और अमिताभ बच्चन को टीवी कार्यक्रम कौन बनेगा करोड़पति के प्रस्तोता के रूप में।" वह मानते हैं कि वह गलत थे।
'आप लोकप्रियता के मामले में शोले की तुलना पीके से कर सकते हैं, लेकिन आप एक 40 साल पुरानी फिल्म से यह उम्मीद नहीं कर कते कि वह आज के महंगे मल्टीप्लेक्स थिएटर की 30 से 40 फीसदी सीटें भर देगी। आश्चर्यजनक रूप से शोले ने यह कर दिया।'
वह कहते हैं कि इसकी वजह यह भी हो सकती है कि शोले के प्रिंट को डिजिटल किया गया है और 3-डी में रिलीज किया गया है। लेकिन ऐसा इसलिए भी है कि न तो मुग़ल-ए-आजम, न ही देवदास और न ही किसी और फिल्म ने स्थानीय बोली को शोले की तरह फिल्म की जुबान में शामिल किया है।
कराची के फिल्म और टीवी पत्रकार हमीद भुट्टो इसका एक उदाहरण देते हैं। 'एक दोस्त, जिसने कुछ दिन पहले एक कार ख़रीदने में मेरी मदद की थी। उसने फोन किया और पूछा कि तुम्हारी धन्नो कैसी चल रही है।'
मैंने उसे जवाब दिया, "थोड़ा पैट्रोल ज्यादा पीती है।"
मुझे एक क्षण के लिए भी संदेह नहीं हुआ कि वह मेरी कार के बारे में ही पूछ रहा है- न कि शोले की घोड़ी के बारे में जो बसंती को बचाने के लिए तूफ़ान की तरह दौड़ी थी।