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'जरा राष्ट्रपति से तो मेरी बात कराओ'

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आप जो पीढ़ी दर पीढ़ी आल इंडिया रेडियो या बीबीसी वगैरह सुनते आ रहे हैं, कभी ख़्याल आया कि हम ब्रॉडकास्टरों की माइक्रोफ़ोन के पीछे की ज़िंदगी में क्या-क्या अजीब और दिलचस्प किस्म की घटनाएँ घटती होंगी।
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मैं कल से एक सीनियर ब्रॉडकास्टर जमील जुबैरी की किताब 'याद ख़ज़ानाः रेडियो पाकिस्तान में 25 साल' पढ़ रहा हूँ। एक जगह जुबैरी साहब लिखते हैं कि 1971 का भारत पाक युद्ध अपने चरम पर था और रेडियो पाकिस्तान से केवल जंगी तराने ही बजाए जा रहे थे।

एक दिन पता चला कि मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ लंदन से लाहौर जाते हुए कराची में रुकी हुई हैं। हमने झट गाड़ी भेजकर उन्हें स्टूडियो में बुलवा लिया और उनसे तीन गीत रिकॉर्ड करवाए। इसके बाद मैडम ने स्टेशन डायरेक्टर से कहा जरा याहया ख़ान से तो मेरी बात कराओ।
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स्टेशन डायरेक्टर घबरा गया क्योंकि मैडम से याहया ख़ान की जितनी भी दोस्ती हो मगर थे तो वो देश के राष्ट्रपति। उनके आगे रेडियो पाकिस्तान के एक मामूली अफ़सर की क्या बिसात।

हैल्लो, हाँ चंदा...

अभी स्टेशन डायरेक्टर अपने सिर पर परेशानी में हाथ घुमा ही रहा था कि मैडम ने फ़ोन घसीट कर ख़ुद ही नंबर डायल कर लिया। "हैल्लो..हाँ चंदा, मैं हुने हुने तीन गीत रिकॉर्ड कराएने, आज रात आठ बजे सुन लवीं..." ये कहकर मैडम नूरजहाँ ने फ़ोन रख दिया।

स्टेशन डायरेक्टर के तो तोते उड़ गए। उसने फ़ौरन दूसरे कमरे से रेडियो पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल को फ़ोन करके पूरी कथा सुनाते हुआ कहा कि आठ बजे तो न्यूज़ का टाइम है और मैडम ने बिना पूछे ही राष्ट्रपति को आठ बजे का टाइम दे दिया कि ये गीत सुन लेना। अब मैं क्या करूँ?

डायरेक्टर जनरल ने सेना मुख्यालय फ़ोन करके सैन्य सचिव से मामला सुलटाया और मैडम के गीत आठ बजे के न्यूज़ बुलेटिन के बाद बजाए गए। ख़ुद बीबीसी में दिलचस्प वाकए होते रहते हैं। जैसे बीबीसी उर्दू में हमारे एक सहयोगी ताश खेलने में इतने खो गए कि स्पोर्ट्स बुलेटिन बनाना ही भूल गए।

जब ऐन वक़्त पर स्टूडियो मैनेजर का परेशान फ़ोन आया तब ये उठकर स्टूडियो की ओर भागे और फूली सांसों के साथ माइक्रोफ़ोन पर बस इतना कह पाए, "इस वक़्त लाहौर में पाकिस्तान और वेस्टइंडीज के टेस्ट मैच में घमासान चल रहा है। वेस्टइंडीज ने दूसरी पारी में अब तक कई रन बनाए हैं और उनके कई खिलाड़ी आउट हो चुके हैं। ये ब्योरा पेश किया जाएगा अगली सेवा में, सुनना न भूलिएगा।"
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'कितना बड़ा अन्याय'

इसी तरह जब 25 दिसंबर, 1989 के दिन रोमानिया के तानाशाह निकोलाई चौसेस्क्यू को फ़ायरिंग स्क्वायड ने गोली मारी तो परवेज़ आलम विश्व भारती के प्रोड्यूसर थे। उनके साथ जो साहब थे उन्होंने क्रिसमस पार्टी में कुछ ज़्यादा ही पी ली थी।

समाचार के बाद परवेज़ आलम ने चौसेस्क्यू के मरने के डिस्पैच का क्यू पढ़ा ताकि बाक़ी ब्योरा उनके सहयोगी सुना सकें। मगर सहयोगी ने कहा, "परवेज़ भाई ब्योरा तो मैं सुना दूँगा मगर यार चौसेस्क्यू का इस तरह क्रिसमस पर मरना कितना बड़ा अन्याय है, नहीं क्या..."

परवेज़ आलम ने कहा, हाँ आप कह सकते हैं मगर डिस्पैच तो पढ़िए...नहीं परवेज़ भाई आप बताए ना कि ये कितना बड़ा जुल्म है चौसेस्क्यू का इस तरह मरना। इसके बाद एक मिनट के लिए प्रसारण रोक दिया गया और बाक़ी विश्व भारती परवेज़ आलम को अकेले ही संभालना पड़ा।

बाद में जाँच बैठी और फिर जो होना था हुआ। ये सब कहने का मक़सद ये है कि हम ब्रॉडकास्टर लोग भी आप ही की तरह इंसान होते हैं, हमें सिर्फ़ ब्रॉडकास्टर मत समझिए।
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