पेशावर हमले के बाद चरमपंथियों पर नकेल कसने के लिए पाकिस्तान सरकार की ओर से उठाए जा रहे कदमों और खासकर सैन्य अदालतों का गठन वहां उर्दू मीडिया की सुर्ख़ियों में है।
चरमपंथ से जुड़े मामलों की तेज रफ्तार सुनवाई के लिए सैन्य अदालत बनाने के फैसले पर नवा-ए-वक्त लिखता है कि हर काम फौज को सौंपना समझदारी नहीं है।
अखबार के मुताबिक सैन्य अफसरों के नेतृत्व में विशेष अदालतें बनाना मौजूदा न्यायपालिका पर अविश्वास करने जैसा होगा, वहीं इसमें कई कानूनी और संवैधानिक दिक्कतें आ सकती हैं।
लिखा गया है कि पाकिस्तानी सेना दहशतगर्दों को तहस-नहस करने में तो सक्षम है पर फौजी अफसरों को कानूनी और संवैधानिक तकाजों के तहत इंसाफ करने में न तो उन्हें महारथ है और न उन्हें इसके लिए तैयार किया जाता है।
'सेना सत्ता संभाले'
इंसाफ लिखता है कि चूंकि विशेषज्ञों के मुताबिक संविधान में सैन्य अदालतें बनाने की कोई गुंजाइश नहीं है, इसीलिए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने इन्हें सैन्य अदालतों की बजाय स्पेशल ट्रायल कोर्ट कहा है, जिनमें कहीं सैन्य अफसर शामिल होंगे तो कहीं मौजूदा जज उनका नेतृत्व करेंगे।
साथ ही अखबार ने अपने संपादकीय में सेना प्रमुख राहील शरीफ के इस बयान को भी जगह दी है कि अगर दहशतगर्दी को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए कानून और संविधान में बदलाव करना पड़े तो उससे गुरेज नहीं होना चाहिए।
लेकिन रोजनामा औसाफ के संपादकीय में सैन्य अदालतों के गठन पर एमक्यूएम के विरोधी तेवर सुनाई पड़ते हैं। अखबार के मुताबिक पार्टी का कहना है कि फौजी अदालतें कायम करने की बजाय फौज दो साल के लिए सत्ता संभाल ले, क्योंकि सरकार तो दहशतगर्दी से नहीं निपट सकती।
औसाफ ने भी लोकतांत्रिक दौर में सैन्य अदालतों के गठन को अचंभे वाली बात बताया है।
मोदी का प्लान नाकाम
दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव के नतीजों पर जंग का संपादकीय है- मोदी का प्लान नाकाम। अखबार लिखता है कि कश्मीर के लोग अपनी कोशिशों में पूरी तरह कामयाब रहे। एक तरफ उन्होंने छह साल से राज करने वाली सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया तो दूसरी तरफ बीजेपी के मंसूबों पर पानी फेर दिया।
अखबार की राय है कि चुनावी नतीजों ने प्रधानमंत्री मोदी के इस मंसूबों पर फिलहाल पानी फेर दिया है कि जम्मू-कश्मीर को पूरी तरह एक भारतीय राज्य बनाकर कश्मीर मुद्दे को दबा ही दिया जाए।
वहीं, रोजनामा एक्सप्रेस ने भारतीय संसद में धर्मांतरण के मुद्दे पर कई दिन तक हुए हंगामे पर संपादकीय लिखा है। अखबार कहता है कि भारत यूं तो धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र है जहां हर किसी को अपने धर्म को मानने की आज़ादी है, लेकिन असल में भारत एक कट्टर हिंदू राष्ट्र में तब्दील होता दिख रहा है।
अख़बार की राय है कि भारत जैसे गरीब देश में लालच या फिर दबाव में किसी का धर्म बदलवाना मुश्किल बात नहीं है, लेकिन ऐसा काम सत्ताधारी पार्टी के तत्वाधान में होना निंदनीय है।
रुख़ भारत का करें तो राष्ट्रीय सहारा ने असम में हुए चरमपंथी हमलों पर लिखा है- बोडो दहशतगर्दी पर सख्त रुख जरूरी। अखबार की राय है कि एक तरफ इन हमलों में मरने वालों की तादाद 78 तक पहुंच गई है, दूसरी तरफ़ इससे न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि पूरा देश हिल गया है और इसीलिए सरकार बोडो दहशतगर्दों को खत्म करने के लिए हर मुमकिन कोशिश का वादा कर रही है।
वहीं हमारा समाज ने अटल बिहारी वाजपेयी और मदन मोहन मालवीय को 'भारत रत्न' देने की सरकार की घोषणा पर लिखा कि भारत रत्न देश का सबसे बड़ा सम्मान है, इसलिए इसे लेकर सियासत नहीं होनी चाहिए।
अखबार की राय में इसे सिर्फ ऐसे लोगों को नहीं दिया जाना चाहिए जो सत्ता में बैठी पार्टी की पार्टी की विचारधारा से जुड़े हों।