सदियों से पाकिस्तान सूफ़ी संतों की जमीन रहा है। इस्लाम की एक रहस्यमयी और सहनशील धारा, जिसकी रस्में सम्मोहित करने वाली हैं। आज भी इसे मानने वाले लाखों की संख्या में हैं लेकिन कट्टर-इस्लाम के विस्तार के साथ, सूफ़ीवाद का दायरा कम हो रहा है।
पाकिस्तान के दक्षिण में स्थित भीत शाह नाम के छोटे से कस्बे में लोग गोधूलि बेला में ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते हुए सूफ़ी संत शाह अब्दुल लतीफ की दरगाह में पहुंचते हैं।
आदमी-औरत यहां कई घंटों या दिनों की यात्रा कर पहुंचते हैं और संगीत की थाप पर झूमकर नाचते हैं। लेकिन तालिबान जैसे चरमपंथी इबादत के इस तरीके पर आगबबूला हैं। दरगाह, सूफ़ी संत, संगीत को वह ग़ैर इस्लामी बताते हैं। इसीलिए सूफ़ी संत अब निशाने पर हैं।
असली इस्लामी शिक्षा
दरगाह को धमकियां मिलने के बाद यहां सुरक्षा बढ़ा दी गई है। संत के 12वें उत्तराधिकारी सैयद वकार शाह लतीफी की गाड़ी पर हाल ही में हमला हुआ था लेकिन वह सुरक्षित बच निकले।
वह कहते हैं, "मुझे चिंता तो है, लेकिन मैं निराश नहीं हूं। मैं मानता हूं कि सूफ़ीवाद हमेशा जिंदा रहेगा। किसी भी सूरत में तालिबानी या चरमपंथी सूफ़ीवाद को खत्म नहीं कर सकते।"
सूफ़ी मानते हैं कि इबादत का उनका तरीका ऊपरवाले से मिलने का सबसे पवित्र तरीका है। लेकिन सूफ़ी संतों का विरोध भी विचारधारात्मक ही है।
'हम सूफी संतों को खारिज करते हैं'
यहां से कुछ घंटे की दूरी पर कराची के एक मदरसे में बच्चे कुरान रट रहे हैं। यह मदरसा पाकिस्तान के हजारों मदरसों में से एक है, जिनमें से बहुत से सऊदी अरब से प्रेरित हैं।
मदरसे के प्रिंसिपल मुफ़्ती मोहम्मद नईम कहते हैं, "हम सूफ़ी संतों को खारिज करते हैं और दूसरे हर वाद को भी। हम बंदूक की संस्कृति को भी खारिज करते हैं। असली इस्लाम की शिक्षा हम ही दे रहे हैं।"
लेकिन सूफ़ी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। पूरे इलाके में दरगाहों के पास सुरक्षा बैरियर बन गए हैं।
'सांस्कृतिक जंग'
कराची में उपन्यासकार बीना शाह कहती हैं कि यह एक सांस्कृतिक जंग है, "जब आप बाहर से आते हैं और किसी ऐसी संस्कृति को देखते हैं...। सिंधी संस्कृति की तरह अंगीकार करने वाली और स्वागत करने वाली है।"
वह कहती हैं, "आप बताने लगते हैं कि ऊपरवाले की इबादत का आपका तरीका गलत ही नहीं अनैतिक भी है और आपको इसकी सजा मिलेगी। न सिर्फ दूसरी दुनिया में बल्कि इस दुनिया में भी हमारे द्वारा। तो यह पूरी तरह मनोवैज्ञानिक हिंसा है।"
लेकिन दरगाह में अब भी लोग ढोल की थापों पर नाचते हुए पहुंच रहे हैं। तालिबान ने बेशक इन पर बंदूकें तान रखी हों लेकिन इन्हें अपने संगीत पर ज्यादा भरोसा है।