भारत और अमेरिका के मजबूत होते रिश्तों पर चीन के सरकारी मीडिया की टिप्पणी पाकिस्तानी उर्दू अखबारों में चर्चा का बड़ा विषय है। रोजनामा 'इंसाफ' ने चीन के अखबार 'ग्लोबल टाइम्स' के इस संपादकीय का जिक्र किया है कि अमेरिका पूरी दुनिया नहीं है।
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पाकिस्तानी अखबार लिखता है कि अमेरिका और उसके सहयोगी पश्चिमी देशों का भारत के साथ असाधारण सहयोग दरअसल चीन को नीचा दिखाने की कोशिशों का हिस्सा है, लेकिन उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि भारत की जीडीपी चीन के मुकाबले सिर्फ बीस फीसदी है।
भारत के मिसाइल टेक्नोलजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) में शामिल होने को फिजूल बताते हुए अखबार लिखता है कि पाकिस्तान इस समूह का सदस्य बनने का इच्छुक भी नहीं है, क्योंकि इस तरह वो किसी भी तरह की पाबंदी से आजाद रहेगा।
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'एमटीसीआर में शामिल होने पर घमंड हो सकता है भारत को'
- फोटो : BBC
अखबार कहता है कि भारत को अमेरिका की शह पर एमटीसीआर में शामिल होने पर घमंड हो सकता है लेकिन उसे हासिल कुछ नहीं होगा। 'नवा-ए-वक्त' लिखता है कि अमेरिका ने भारत को एमटीसीआर का सदस्य बनने पर बधाई देते हुए संकेत दिया कि वो उसे एनएसजी में शामिल कराना चाहता है और वह सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता की भी कोशिशें जारी रखेगा।
अखबार ने कश्मीर मुद्दे से लेकर संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान का बचाव करने, एनएसजी में शमिल होने की भारत की कोशिशों को नाकाम करने और पाक-चीन आर्थिक कॉरिडोर जैसे सभी मुद्दों पर चीन के समर्थन की तारीफ की है।
अखबार लिखता है कि भारत और अमेरिका के गठजोड़ पर दो टूक रुख अपनाने की जरूरत है और ये चीन पाकिस्तान के गठबंधन से ही मुमकिन होगा।
'गरीबी और अज्ञानता से लड़ने की जरूरत'
- फोटो : BBC
वहीं 'एक्सप्रेस' ने अपने संपादकीय में भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत शुरू करने पर जोर दिया है। अखबार लिखता है कि दोनों देशों में कई लॉबियां काम कर रही हैं जिसमें एक लॉबी का कहना है कि जंग से तबाही के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा और दोनों देशों की सरकारों को दशकों से चली आ रही गरीबी, अज्ञानता और बीमारियों से लड़ना चाहिए। अखबार लिखता है कि दूसरी तरफ ऐसी ताकतवर लॉबियां भी मौजूद हैं जिनके हित दोनों देशों के दोस्ताना रिश्तों से मेल नहीं खाते हैं।
अखबार लिखता है कि जब दोनों देशों को पता है कि क्षेत्र में सुरक्षा और शांति बातचीत और दोस्ताना रिश्तों से ही आ सकती है तो फिर इस तरफ तेजी से कदम बढ़ाए जाएं, ताकि शांति की दुश्मन ताकतों का एजेंडा नाकाम बनाया जा सके।
'जंग' ने ‘क्षेत्र में अमेरिका की भूमिका’ शीर्षक से लिखा है कि कश्मीर मुद्दे को लेकर अमेरिका अपनी जिम्मेदारी दशकों से पूरी नहीं कर रहा है। अखबार कहता है कि अमेरिका तो भारत को और ताकतवर बना कर क्षेत्र के शक्ति संतुलन को बिगाड़ने पर तुला है। अखबार की टिप्पणी है कि इससे ना सिर्फ कश्मीर विवाद का न्यायपूर्ण तरीके से हल और मुश्किल होगा बल्कि क्षेत्र में अस्थिरता का खतरा भी बढ़ेगा।
'पाकिस्तानी फौज लोकतंत्र की समर्थक है'
- फोटो : BBC
वहीं 'जसारत' ने पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के इस बयान पर संपादकीय लिखा है कि पाकिस्तानी फौज लोकतंत्र की समर्थक है और भारत से बातचीत की विरोधी नहीं है।
अखबार लिखता है कि सवाल ये है कि सेना की तरफ से बारबार इस बात का भरोसा दिलाने की जरूरत क्यों पड़ती है कि वो लोकतंत्र समर्थक है क्योंकि जब भी ऐसी सफाई दी जाती है तो शक होता है कि कहीं न कहीं कोई गड़बड़ है।
भारत से बातचीत के मुद्दे पर अखबार लिखता है कि दोतरफा रिश्तों में सबसे बड़ी बाधा कोई और नहीं बल्कि भारत की सरकारें रही हैं। अखबार की राय में भारत की सरकारें कश्मीर का जिक्र आते ही आग बबूला हो जाती हैं और अब तो भारतीय जनता पार्टी के रूप में भारत में कट्टरपंथियों का राज है जो पाकिस्तान विरोधी है।
'स्विस बैंक में हिंदुस्तानियों का पैसा घटा'
- फोटो : BBC
रुख भारत का करें तो 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' का संपादकीय है- स्विस बैंक में हिंदुस्तानियों का पैसा घटा। अखबार ने ताजा आंकड़ों के हवाले से लिखा है कि स्विस बैकों में भारतीय की रकम 8,392 करोड़ रुपए रह गई है जो 1997 के बाद से हिंदुस्तानियों की सबसे कम रकम है।
अखबार की राय है कि इस कमी की एक वजह काले धन के खिलाफ केंद्र सरकार की कड़ी नीतियां हैं। साथ ही स्विस बैंकों में अब पहले की तरह गोपनीयता नहीं रही है।
अखबार कहता है कि सवाल ये है कि जब स्विस बैंकों में पैसा घट रहा है तो ये जा कहां रहा है? कुछ सूत्रों का हवाला देते हुए अखबार कहता है कि हो सकता है ये पैसा मध्य पूर्व के देशों में जा रहा हो या फिर हवाला के जरिए भारत लाया जा रहा हो।
वहीं इस्तांबुल के हवाई अड्डे पर हालिया हमले की भी अखबारों ने चर्चा की है। 'हमारा समाज' लिखता है कि चरमपंथ का खात्मा होना जरूरी है। अखबार की राय है कि तुर्की इस्लामिक स्टेट के सीधे निशाने पर है और इसकी एक वजह सीरिया से लगने वाली वो सीमा है जहां से शरणार्थियों में शामिल होकर चरमपंथी भी तुर्की में घुस जाते हैं।
इसी मुद्दे पर 'अखबार-ए-मशरिक' की राय है कि इस्लामिक स्टेट को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में सहयोग और एकजुटता की कमी है और इसीलिए उससे ठीक तरीके से नहीं निपटा जा रहा है। अखबार कहता है तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन को चाहिए कि वो कुर्दों पर तवज्जो देने की बजाय पूरा ध्यान इस्लामिक स्टेट से लोहा लेने में लगाएं।