पाकिस्तान के 66 साल के इतिहास में यह चुनाव इसलिए खास है क्योंकि देश में पहली दफ़ा एक नागरिक सरकार सेना को नहीं एक दूसरी नागरिक सरकार को सत्ता सौंपेगी। आम चुनाव के लिए मतदान शुरू हो चुका है।
चुनाव सर्वेक्षण इस बात की संभावना जता रहे है कि संसद में किसी को बहुमत हासिल नहीं होगा और गठबंधन से जो सरकार तैयार होगी वो कमज़ोर होगी।
सर्वेक्षणों के मुताबिक़ वोटरों के बीच पूर्व क्रिकेटर इमरान ख़ान के पाकिस्तान तहरीके इंसाफ़ या पीटीआई के लिए चुनावी प्रचार के आख़िरी दिनों में समर्थन में इज़ाफ़ा हुआ है।
लेकिन इसके बावजूद नवाज़ शरीफ़ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) को सबसे ज़्यादा सीटें मिलेंगी।
पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के नेता और राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी की चुनावी मुहिम थोड़ी धीमी रही है।
जिसका असर सर्वे के मुताबिक़ पार्टी के वोट प्रतिशत पर पड़ेगा।
ये पहली बार है कि पाकिस्तान चुनाव को लेकर कोई ठोस बात नहीं कही जा सकती।
और ऐसा सिर्फ़ इसलिए नहीं है क्योंकि पहली बार जनता की चुनी सरकार एक प्रजातांत्रिक तरीक़े से तैयार सरकार को हुकूमत की बागडोर सौंपेगी।
इस चुनाव में बहुत सारे ऐसे नए पहलू हैं जिसने इसे अप्रत्याशित बना दिया है।
इमरान ख़ान
क्रिकेटर से राजनीतिज्ञ बने इमरान ख़ान ने, जिन्हें एक समय तक काफ़ी लोग संजीदगी से नहीं ले रहे थे, ज़बर्दस्त प्रचार कर पूरे चुनाव में एक नया मोड़ ला दिया है।
चंद दिनों पहले लिफ्ट से गिरने के बाद अस्पताल में भर्ती होने से पहले वो एक-एक दिन में सात-सात रैलियां और आम सभाएं कर रहे थे।
सरकारी अधिकारी, गुप्त तौर पर कहते हैं कि उनके आंतरिक सर्वे के मुताबिक़ पीटीआई को अच्छी ख़ासी सीटें हासिल होंगी।
इमरान को अलग अलग समूहों का समर्थन हासिल मिल रहा है।
उनके सबसे बड़े समर्थकों में युवा वर्ग है।
उनमें से तो बहुत सारे ये भी कह रहे हैं कि वो अपने परिवार वालों के कहने पर नहीं बल्कि अपने मन से वोट देंगे।
आजा़द ख़्याल विचारों के लोगों में भी उनकी अपील कम नहीं।
वो उम्मीद करते हैं कि कभी पश्चिमी रंग में रंगे इमरान ख़ान अपने वो दिन फिर से जियेंगे।
हांलाकि मध्यम वर्गीय जनता में भी उन्हें समर्थन हासिल है लेकिन ये वो तबक़ा है जिसने हाल के चुनावों में ज़्यादातर वक़्त हिस्सा नहीं लिया था।
परवेज़ मुशर्रफ़ की हुकूमत के दौर में मुल्क में वैसे लोगों की तादाद बढ़ी जिन्होंने अपनी संपत्ति में इज़ाफ़ा किया।
लेकिन ये वर्ग बहुत रूढ़िवादी, अमरीका-विरोधी, मज़हबी और राष्ट्रवादी है और उच्च वर्ग से बहुत नाराज़ है।
हाल के दिनों में इमरान ख़ान ने जिस तरह के भाषण दिए हैं उससे ये लगा है जैसे वो इनकी बातें कह रहे हों।
नए मतदाता
चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट से तीन करोड़ सत्तर लाख फ़र्ज़ी वोटरों के नाम निकाल दिए हैं।
जबकि तीन करोड़ साठ लाख नए मतदाताओं का नाम उसमें जोड़ा गया है।
नई मतदाता सूची ने चुनाव में मौजूद अनिश्चितता में एक नया अंश जोड़ दिया है।
हालांकि कुछ पुरानी चीज़े वैसी ही हैं।
पाकिस्तान के कुछ हिस्सों जैसे सिंध के भीतरी इलाक़ों, बलुचिस्तान, दक्षिणी पंजाब और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में पूरानी क़बायली व्यवस्था बनी हुई है जहां वोटिंग पुराने तर्ज़ पर ही होगी।
इसका मतलब ये हुआ कि चुनाव का फ़ैसला मुल्क के सबसे धनी प्रदेश पंजाब में होगा।
पंजाब के कई चुनाव क्षेत्रों में पीपीपी, पीटीआई और पीएमएल (एन) के बीच त्रिकोणीय मुक़ाबला है।
इस वजह से चुनाव के नतीजों को लेकर कुछ कहना और अधिक मुश्किल हो गया है।
ऐसा लग रहा है कि देश के स्तर पर किसी भी राजनीतिक दल को बहुमत हासिल नहीं होगा।
और जिस दल को भी सबसे अधिक सीटें मिलेंगी उसी के नेता को गठबंधन तैयार करने की पहल करनी होगी।
तालिबान की धमकी
तालिबान ने खुलकर मुल्क की तीन बड़ी पार्टियों को धमकी दी जिसमें सत्तारूढ़ पीपीपी शामलि है।
इसकी वजह से पार्टी का चुनावी मुहिम धीमा रहा।
चरमपंथियों ने राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों, पार्टी कार्यालयों और कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया है।
इस तरह के हमलों में जिसमें कम से कम 110 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई है।
पिछली बार यानी साल 2008 के चुनावों के दौरान तालिबान ने लड़ाई पर विराम लगा रखा था।
मज़बूत न्यायपालिका
पहले जो पार्टी सत्ता में होती थी न्यापालिका भी उनके साथ हो लेती थी।
लेकिन हाल के दिनों में न्यायपालिका बार-बार राजनीतिज्ञों के खिलाफ़ खड़ी होती रही है।
मुल्क के एक प्रधानमंत्री को अदालत के दबाव में ही पद छोड़ना पड़ा।
हाल में पूर्व सेनाध्यक्ष और राष्ट्रपति के मामले में उन्होंने जिस तरह के क़दम उठाए हैं।
उससे तो एक राय ये भी बनी है कि वो फौज का भी एक हद तक सामना करने को तैयार हैं।
हालांकि सेना परवेज़ मुशर्रफ़ के मामले से बहुत खुश नहीं है और उसे ये चिंता सता रही है कि कहीं इसी तरह का मामला रोज़ की बात न बन जाए।
वो कोशिश कर रही है कि मुशर्रफ़ को मुल्क से बाहर जाने की इजाज़त मिल जाए।
अभी तक तो अदालत ने ऐसा करने से मना कर दिया है।
मीडिया की ताक़त
सैटेलाइट टीवी मिनट-मिनट की ख़बर प्रसारित कर रहे हैं जिसने मीडिया की पहुंच जनता के बीच बहुत बढ़ा दी है।
राजनेताओं के लिए ये चुनावों में धांधली करना अब उतना आसान नहीं रह गया है।
हाल में ही हुए एक उप-चुनाव में किसी नेता ने एक चुनाव अधिकारी को थप्पड़ मार दिया।
वहां मौजूद किसी व्यक्ति ने इसकी तस्वीर अपनी मोबाइल पर ले ली।
कई दिनों तक ये क्लिप चैनलों पर दिखाया जाता रहा और मांग उठती रही कि उस उम्मीदवार को चुनाव के लिए अयोग्य क़रार दिया जाए।
हालांकि ये कहा जा रहा है कि इसके बावजूद संसद में उसकी मौजूदगी महत्वपूर्ण रहेगी।