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पाकः चुनाव पूरे, पर आठ सवाल बाकी

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पाकिस्तान में इस बार आम चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक रहे। न सिर्फ बड़ी संख्या में लोगों ने मतदान किया, बल्कि पहली बार एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार नई नागरिक सरकार को सत्ता सौंपेगी।
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चुनावों में कई पार्टियों के उम्मीदवारों पर हमले हुए।

साथ ही परवेज मुशर्रफ जैसे कई बड़े नाम राजनीति के मैदान में फिसड्डी साबित हुए।

पाकिस्तान में आम चुनाव के बाद कुछ ऐसे सवाल और उनके जवाब।

सेना से कैसे निपटेंगे नवाज शरीफ?

ये बात सही है कि 1999 में न सिर्फ़ सेना ने नवाज़ शरीफ़ का तख्ता पलट किया बल्कि उन्हें जेल में भी डाला गया। लेकिन अब हालात बदल गए हैं।

नवाज़ शरीफ़ अब परिपक्व हो गए हैं। वहीं पाकिस्तानी सेना में भी बदलाव देखने को मिला है। पाकिस्तान की सेना अब उतनी ताक़तवर नहीं रही जितनी पहले होती थी। सेना कई चुनौतियों से घिरी हुई है।

देश के उत्तरी इलाक़े में वो कई अभियान चल रही है। तालिबान की कड़ी चुनौती वो झेल रहे हैं। पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान के कारण भी उस पर दबाव है। ऐसे में न उसे सियासत के लिए फुरसत है और न ही उसकी अब दिलचस्पी है।
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दूसरी तरफ नवाज़ शरीफ़ के सामने भी कई चुनौतियां है। जिस जनता से उन्हें वोट दिया है, उसकी बिजली-पानी की किल्लत, महंगाई और बेरोज़गारी जैसे समस्याओं से उन्हें निपटना है।

यानी अब सेना और प्रधानमंत्री दोनों की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। ऐसे में टकराव होने की संभावना कम है।

क्या चरमपंथियों से नवाज़ शरीफ़ का कोई समझौता था?

नवाज शरीफ के बारे में हम कहते हैं कि दक्षिणपंथ की तरफ उनका झुकाव रहा है। उन्होंने इस बार चुनावों में दो पंजाबी जिहादियों को टिकट दिए थे, जिनके खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं।

इससे पहले भी नवाज़ शरीफ़ ऐसे दलों के साथ गठजोड़ कर चुके हैं जो जिहादी हैं या शियाओं पर हमले करते हैं।

उनके भाई शाहबाज़ शरीफ़ पांच साल तक पंजाब के मुख्यमंत्री रहे लेकिन उन्होंने कभी पंजाबी जिहादियों पर हाथ नहीं डाला। इसलिए कुछ सवालिया निशान ज़रूर हैं।

ऐसे में देखना होगा कि क्या नवाज़ शरीफ़ फौज को नाराज कर तालिबान के साथ बातचीत शुरू करेंगे। हालांकि जनता यही चाहती है क्योंकि सैन्य तरीकों से ये मसला सुलझ नहीं रहा है।

लेकिन सेना प्रमुख कहते हैं कि वो इनसे बात नहीं करेंगे। नवाज शरीफ के लिए ये इम्तिहान होगा। लेकिन बड़ा इम्तिहान इमरान ख़ान के लिए है जिनकी पार्टी खैबर पख्तून ख्वाह प्रांत में सरकार बनाने जा रही है।

इमरान खान चरमपंथियों से बातचीत के पैरोकार रहे हैं। लेकिन क्या वाकई फौज उन्हें बातचीत की तरफ जाने देगी।
और क्या तालिबान इमरान की बातचीत की पेशकश को मानेंगे और खैबर पख्तून ख्वाह में खून खराबा बंद होगा? इन सवालों का जवाब मिलना अभी बाकी है।

क्या चरमपंथियों पर नरम रवैए से भारत को चिंतित होना चाहिए?

बिल्कुल होना चाहिए। नवाज़ शरीफ़ को मनमोहन सिंह ने भारत आने की दावत दी है।

भारत से भी कई पत्रकार पाकिस्तान आए, उन्होंने नवाज़ शरीफ़ के इंटरव्यू किए। लेकिन मुझे हैरानी है कि किसी ने ये नहीं पूछा कि आपने पंजाबी तालिबान को टिकट क्यों दिए हैं और जिहादियों को आगे बढ़ने से आप क्यों नहीं रोकते हैं।

उनसे पूछा जाना चाहिए था कि आमिर अजमल कसाब कैसे पंजाब से मुंबई में हमला करने पहुंच जाता है।

नवाज़ शरीफ़ से जबाव तलब किया जाए कि उन्होंने दक्षिणपंथियों के खिलाफ क्यों रवैया नरम रखा है? चुनाव प्रचार के दौरान तालिबान ने कभी पीएमएल(एन) को निशाना बनाने की न तो धमकी दी और न ही ऐसा किया।

पाकिस्तानी पत्रकार उनसे चरमपंथियों के प्रति नरम रवैया रखने के बारे में सवाल पूछते हैं लेकिन भारतीय पत्रकारों ने उनसे ये सवाल नहीं किया।

पाकिस्तान आना मुशर्रफ की सबसे बड़ी भूल रही?

बिल्कुल। मुशर्रफ एक ऐसे सितारे साबित हुए जो थोड़ी देर के लिए चमका और फिर टूट गया। बेशक उनसे ग़लती हुई है।

हालांकि वो इसलिए पाकिस्तान नहीं आए थे कि उन्हें पाकिस्तान से कोई लगाव था। उन्हें लगा था कि पाकिस्तान में उनके बहुत चाहने वाले हैं और चुनाव में हिस्सा लेंगे तो कामयाब होकर संसद में बैठेंगे।

उनकी पार्टी भी गजब अनुशासनहीनता का शिकार दिखी। पार्टी ने चुनाव का बहिष्कार किया लेकिन उसके एक कार्यकर्ता ने न सिर्फ चितराल चुनाव लड़ा, बल्कि विजयी भी हुआ।

वैसे मुशर्रफ का मामला दिखाता है कि किस्मतें किस तरह बदलती हैं।

यही वो मुशर्रफ हैं जिन्होंने नवाज़ शरीफ़ को पहले जेल में डाला और फिर निर्वासन में भेज दिया। लेकिन अब नवाज़ शरीफ़ प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले हैं और मुशर्रफ़ एक तरह से अपने ही घर पर जेल में बंद हैं और उनके सिर पर गंभीर किस्म के मामले आकर पड़े हैं।

क्या मुशर्रफ़ को नवाज़ शरीफ़ से डरने की ज़रूरत है?

डरने की ज़रूरत इसलिए नहीं है क्योंकि नवाज़ शरीफ़ साफ़ कर चुके हैं कि मुशर्रफ़ से उनकी कोई निजी लड़ाई नहीं है। ये तो संस्थानों की लड़ाई थी। सेना और चुनी हुई सरकार की लड़ाई।

दूसरा, पाकिस्तान की न्यायपालिका स्वतंत्र है। वही मुशर्रफ़ के मुक़दमों को देखेगी। इसमें नवाज़ शरीफ़ का कोई दखल नहीं होगा।

ये दूसरी बात है कि मौजूदा चीफ़ जस्टिस को भी मुशर्रफ़ ने नाराज़ किया था जब उन्हें हटा दिया था।

लेकिन मुशर्रफ़ पर जो देशद्रोह के आरोप हैं, उसमें फांसी तक की सजा का प्रावधान है।

दरअसल सेना ने पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी दे दी थी, बेनजीर भुट्टो को निर्वासन में भेज दिया, नवाज़ शरीफ़ को जेल में डाल दिया और फिर देश निकाला दे दिया, तो पाकिस्तानी जनता ये जानना चाहती है कि क्या ये सज़ाएं सिर्फ़ राजनेताओं के लिए ही हैं। एक जनरल जो संविधान को तोड़ सकता है, क्या उसे ऐसी सज़ा मिल सकती है?

चुनाव से पहले सुर्ख़ियों में रहे ताहिरुल कादरी कहां गायब हो गए?

वो भी टिमटिमा कर टूट जाने वाले तारे रहे। उन्होंने हालात का फ़ायदा उठाया। कुछ समय के लिए इस्लामाबाद में आए, शोर शराबा किया और चले गए।

ये अंदेशा पहले ही था कि वो आएंगें और ग़ायब हो जाएंगे। बेहतर यही होगा कि वो कनाडा में ही रहें जहां वो रहते हैं।

याद कीजिए कि उन्होंने अपनी रैली के लिए कैसे बच्चों और औरतों को इस्लामाबाद में ठंड और बारिश में बंधक बना कर रखा, सिर्फ अपनी महत्वाकांक्षा के लिए।

पाकिस्तान में अब उनका नाम कोई नहीं ले रहा है। अख़बारों से तो वो कब के गायब हैं।

क्या बिलावल भुट्टो का जादू नहीं चला?

बिलावल अभी बच्चे हैं। उनकी तुलना अक्सर राहुल गांधी से होती है लेकिन मैं इसे सही नहीं मानती।

दरअसल राहुल की परवरिश उनकी मां सोनिया गांधी शुरू से इस तरह की थी कि वो राजनीतिक विरासत को संभालेंगे। लेकिन बेजनीर भुट्टो ने अपने बच्चों को छिपा कर रखा था, उनकी तालीम पर ध्यान दिया। वो नहीं चाहती थी कि उनके बच्चे अभी सियासत में आगे आएं।

बेनजीर ने कभी ऐसी इच्छा नहीं जताई कि उनके बच्चे आगे आएं और राजनीति में शामिल हों।

बिलावल की उम्र अभी कम है। देखना होगा कि वो अपने नाना की तरह एक सिंधी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर उसी तरह ला सकते हैं या नहीं।

अभी जरदारी परिवार का पीपुल्स पार्टी में दबदबा है। बिलावल अपनी बुआ फरयाल तालपुर के करीब नहीं रहे हैं और वो अपनी मौसी से भी उनका ज्यादा वास्ता नहीं रहा है। बिलावल के आसपास माहौल अभी भुट्टो कम और जरदारी वाला ज्यादा है, जिसमें वो सहज नहीं हैं।
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पूर्व पीएम गिलानी के अगवा बेटे का क्या हुआ?

वो अभी तक लापता हैं। चुनाव की गहमागहमी में मीडिया ने उसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी।

लेकिन यहां यूसुफ रजा गिलानी की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने इतना सब होने के बाजवूद चुनाव का बहिष्कार नहीं किया।

उन्होंने कहा कि अगर बदला लेना है तो वोट के जरिए, लोकतंत्र के जरिए ही लेंगे।

अभी तक गिलानी के बेटे के अपहरण की जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली है। इसके पीछे की वजह भी साफ नहीं है।

मारियाना बाबर/राजनीतिक विश्लेषक
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