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'फौज की वजह से भी हमारी जिंदगी प्रभावित हुई'

Sat, 30 Mar 2013 03:46 PM IST
बीबीसी हिंदी
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मलाला यूसुफ़ज़ई के इन लफ्ज़ों में वे तकलीफें और खौफ़ क़ैद हैं, जो स्वात की रोजमर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गए हैं। मगर इसके लिए फ़ौज भी जिम्मेवार है। मलाला की डायरी की दूसरी कड़ी पढ़िए।
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बुधवार, सात जनवरी, 2009: तुम्हें स्कूल जाते व़क्त डर नहीं लगता।

मैं मोहर्रम की छुट्टियां मनाने बूनीर आई हूं। बूनीर मुझे बहुत पसंद आया है। यहां चारों तऱफ पहाड़ और हरी-भरी वादियां हैं।

मेरा स्वात भी तो बहुत खूबसूरत है लेकिन वहां शांति नहीं। यहां शांति भी है और सुकून भी। न फायरिंग की आवाज़ और न ही कोई खौ़फ। हम यहां बेहद खुश हैं।

खूबसूरत चूड़ियां और झुमके
आज हम पीर बाबा के मज़ार पर गए थे। लोग मन्नत मांगने के लिए आए थे और हम तफ़रीह के लिए।

यहां कितनी खूबसूरत चूड़ियां, झुमके, लॉकेट व़गैरह बिकते हैं। मगर मुझे कुछ भी पसंद नहीं आया। अलबत्ता अम्मी ने झुमके और चूड़ियां खरीद लीं।

शुक्रवार, नौ जनवरी 2009: मौलाना शाह छुट्टी पर चले गए।
आज मैंने स्कूल में अपनी सहेलियों को बूनीर के स़फर के बारे में बताया।

फिर हम सहेलियां तालिबान रहनुमा मौलाना शाह दौरान की मौत की उड़ाई गई खबर पर बहस करने लगीं।

उन्होंने ही लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी का ऐलान किया था। जुमे को हमारे ट्यूशन की छुट्टी होती है इसलिए हम आज देर तक खेलते रहे।

अभी-अभी ज्योंही मैं टीवी देखने बैठी, खबर आई कि लाहौर में धमाके हो गए हैं। या अल्लाह, दुनिया में सबसे ज़्यादा धमाके पाकिस्तान में ही क्यों होते हैं?

बुधवार, 14 जनवरी, 2009: शायद दोबारा स्कूल ना आ सकूं?
आज मैं स्कूल जाते व़क्त बहुत उदास थी क्योंकि कल से सर्दियों की छुट्टियां शुरू हो रही हैं।

हेड मिस्ट्रेस ने छुट्टियों का ऐलान तो किया मगर निश्चित तारी़ख नहीं बताई।

स्कूल जाने पर पाबंदी
ऐसा पहली बार हुआ है। पहले हमेशा छुट्टियों के खत्म होने की निश्चित तारी़ख बताई जाती थी।

इसकी वजह तो उन्होंने नहीं बताई लेकिन मेरा ख्याल है कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि तालेबान ने पंद्रह जनवरी के बाद लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी की घोषणा की है।

इस बार, लड़कियां भी छुट्टियों को लेकर पहले की तरह ज्यादा खुश नहीं थीं। शायद इसलिए कि अगर तालिबान ने अपने ऐलान पर अमल किया तो वे स्कूल दोबारा न आ सकें।

हालांकि, कुछ लड़कियां को पूरी उम्मीद थी कि इंशा अल्लाह फरवरी में स्कूल दोबारा खुल जाएंगे। मुझे भी उम्मीद है कि इंशा अल्लाह हमारा स्कूल बंद नहीं होगा।

लेकिन फिर भी निकलते व़क्त मैंने स्कूल की इमारत पर यूं नज़र डाली मानो दोबारा कभी यहां नहीं आ सकूंगी।

गुरुवार, 15 जनवरी 2009: तोपों की घन गरज से भरपूर रात।
पूरी रात तोपों की भारी घन गरज थी जिसकी वजह से मैं तीन बार जागी। स्कूल की छुट्टियां भी आज ही से शुरू हो गई हैं।

आज 15 जनवरी है। यानी तालेबान की तऱफ से लड़कियों के स्कूल न जाने की धमकी की आ़खिरी तारी़ख।

मगर मेरी सहेली कुछ इस अंदाज से होमवर्क कर रही है जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

उपनाम ‘गुल मकई’
आज मैंने म़कामी अ़खबार में बीबीसी पर प्रसारित होने वाली अपनी डायरी भी पढ़ी। मेरी मां को मेरा उपनाम ‘गुल मकई’ बहुत पसंद आया।

वे अब्बू से कहने लगी, “क्यों न हम अपनी बेटी का नाम बदल कर गुल मकई ही रख दें।” मुझे भी यह नाम ज्यादा पसंद आया।

क्योंकि मेरे असली नाम का मतलब ‘गम में डूबा हुआ इंसान’ है।

अब्बू ने बताया कि चंद रोज पहले भी किसी ने डायरी का प्रिंटआउट लाकर उन्हें दिखाया था और कह रहा था कि ये देखो स्वात की किसी शख्स की कितनी ज़बरदस्त डायरी छपी है।
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अब्बू ने कहा कि मैंने मुस्कराते हुए डायरी पर नज़र डाली और डर के मारे यह भी न कह सका कि ‘हां, यह तो मेरी बेटी की है।’

रविवार: 18 जनवरी, 2009: तालिबान नहीं, सिक्योरिटी फोर्सेज भी ज़िम्मेदार।
आज अब्बू ने बताया कि हुकूमत ने आश्वासन दिया है कि वह हमारे स्कूलों की हि़फाज़त करेगी।

वज़ीर ए आज़म ने भी हमारे बारे में बात की है। मैं खुश हुई। लेकिन इससे तो हमारा मसला हल नहीं होगा।

यहां हम स्वात में रोज़ाना सुनते हैं कि फलां जगह पर इतने फौजी मारे गए हैं, उधर उतने अ़गवा हो गए। पुलिस वाले तो आजकल शहर में ही नज़र आते हैं।

तालेबान का दमन
हमारे मां-बाप बहुत डरे हुए हैं। वे कहते हैं कि जब तक तालेबान खुद अपना एलान वापस नहीं लेते, वह हमें स्कूल नहीं भेजेंगे।

खुद फौज की वजह से भी हमारी तालीम प्रभावित हुई है।

आज हमारे मोहल्ले का एक लड़का जब स्कूल गया तो वहां उस्ताद ने उसे घर वापस जाने के लिए कहा।

उन्होंने बताया कि कर्फ्यू लगने वाला है। मगर जब वह वापस आया तो पता चला कि कर्फ्यू नहीं लगा है, बल्कि, उस रास्ते से फौजी का़फिले को गुज़रना था इसलिए स्कूल से छुट्टी कर दी गई।
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सोमवार, 19 जनवरी, 2009: स्कूल की बिल्डिंग को क्यों सजा दी जा रही है?
आज फिर पांच स्कूलों को बमों से उड़ा दिया गया। इनमें से एक स्कूल तो मेरे घर के करीब ही पड़ता है।

मैं हैरान हूं। ये स्कूल तो बंद थे फिर क्यों उन्हें आग लगाई गई।

तालिबान के डेडलाइन के बाद तो किसी ने भी स्कूल में कदम नहीं रखा था। आखिर ये लोग बिल्डिंगों को क्यों सजा दे रहे हैं?

आज मैं अपनी एक सहेली के घर गई थी। वहां मुझे पता चला कि चंद रोज पहले मौलाना शाह दौरान के चचा का किसी ने कत्ल कर दिया था।

शायद इसीलिए तालेबान ने गुस्से में आकर इन स्कूलों को जला दिया है।

सुस्त फौज
फौजी भी कुछ नहीं कर रहे। बस पहाड़ों में अपने मोर्चों में सुस्त बैठे हुए हैं। बकरियां काटते हैं और मज़े लेकर खाते हैं।

गुरुवार, 22 जनवरी 2009: जहां फौजी वहां तालिब, जहां तालिब वहां फौजी नहीं।
स्कूल बंद होने के बाद घर पर बैठे-बैठे बहुत बोर हो रही हूं। मेरी कुछ सहेलियां स्वात से चली गईं हैं। स्वात में आजकल हालात फिर से बिगड़ने लगे हैं।

घर से निकलने में डर लगता है। रात को मौलाना शाह दौरान ने एफएम चैनल पर अपने भाषण में ये धमकी दी कि लड़कियां घर से न निकलें।

उन्होंने ये भी कहा कि फौज जिस स्कूल को मोर्चे के तौर पर इस्तेमाल करेगी वह उसे धमाके से उड़ा देंगे।

अब्बू ने आज घर में हमें बताया कि हाजी बाबा में लड़कियों और लड़कों के हाई स्कूलों में भी फौजी आ गए हैं। अल्लाह खैर करे।

फौज भी क्यों तालेबान को ऐसा करने से नहीं रोकती। मैंने देखा है कि जहां फौज होगी वहां तालिब होगा मगर जहां तालिब होगा वहां फौजी नहीं जाएगी।

जारी है...
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