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'नवाज शरीफ फूंक-फूंककर रखेंगे कदम'

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भारत-पाक नियंत्रण रेखा पर सैनिकों की हत्या के बाद पाकिस्तानी फ़ौज पर संदेह की उंगलियां उठी हैं। नवाज़ शरीफ़ की हुकूमत और फ़ौज के ताल्लुकात भी चर्चा के केंद्र में हैं। अगले महीने पाकिस्तान में नए सेना प्रमुख का चुनाव होना है। इस्लामाबाद ब्यूरो प्रमुख हारुन रशीद का विश्लेषण।
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पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ़ सरकार को सत्ता संभाले अभी दो माह ही हुए हैं। नई सरकार और फ़ौज के बीच अभी कटुता या गर्मजोशी दोनों ही देखने को नहीं मिली हैं।

भारत के साथ बेहतर ताल्लुकात के लिए शुरू में नवाज़ शरीफ़ ने गर्मजोशी भरे बयान ज़रूर दिए थे और कहा था कि वो चाहते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री पाकिस्तान का दौरा करें।

शरीफ़ बरत रहे हैं अहतियात

मगर अब माना जा रहा है कि उन्होंने अहतियात बरतना शुरू कर दिया है। हालांकि बैकडोर डिप्लोमेसी के ज़रिए रिश्ते सुधारने की तरफ़ इशारे हो रहे हैं, पर इनमें तेज़ी नज़र नहीं आ रही है।
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अगले महीने पाकिस्तान फ़ौज में सत्ता परिवर्तन होना है। हालांकि नवाज़ शरीफ इस मामले में काफ़ी अहतियात बरतने वाले हैं।

इतिहास देखें तो फौज के साथ उनके रिश्ते अच्छे नहीं रहे हैं। अतीत में नवाज़ शरीफ़ और फ़ौज के बीच दो बार तनातनी हो चुकी है। इस बार शरीफ़ ज़्यादा विरोधी स्वर नहीं रखेंगे और इसीलिए उन्होंने पद संभालने के बाद आर्मी हेडक्वार्टर का दौरा भी किया और मीटिंग ली।

इसमें यह भी साफ़ है कि अगर वो पिछली बार की तरह प़ॉलिसी अपनाते हैं और सेना को विश्वास में नहीं लेते तो दोबारा तनाव सामने आने का खतरा भी है। इसकी वजह यह है कि पाकिस्तान फ़ौज ख़ुद को देश के हितों का सबसे बड़ा रक्षक समझती है और जब-जब सरकारें आईं हैं तो उसने उन्हें ज़्यादा तवज्जो नहीं दी।

फिलहाल सेना सरकार के साथ

इस बार नियंत्रण रेखा पर हुई वारदात में भी पाकिस्तानी सेना ने सीधे कोई बयान नहीं दिया है बल्कि उन्होंने विदेश मंत्रालय की तरफ़ से बयान दिलवाया। फ़ौज दिखाना चाहती है कि वह और नवाज़ शरीफ़ सरकार एक साथ हैं।

हालांकि ताजा़ वारदात के पीछे नॉन स्टेट एक्टर्स की भूमिका को नकारा भी नहीं जा सकता। मगर यह नहीं कहा जा सकता कि इसके पीछे पाकिस्तानी फ़ौज किस हद तक है।

माना जा रहा है इन्हीं सब चीज़ों को देखते हुए इस बार नवाज़ शरीफ़ नए सेना प्रमुख के चुनाव में काफी अहतियात बरतेंगे। लोग कह रहे हैं कि वो सेफ़ गेम खेलेंगे। पहले ऐसा होता रहा है कि मौजूदा सेना प्रमुख के बाद सबसे वरिष्ठ उत्तराधिकारी को नहीं चुना जाता था।

नतीजा यह होता था कि वह लीडरशिप के ख़िलाफ़ चले जाते थे। इस बार शायद नवाज़ शरीफ़ सबसे वरिष्ठ उत्तराधिकारी को सेना प्रमुख बनाएंगे और ज्यादा महत्वाकांक्षी होकर अपनी पसंद-नापंसद को उसमें शामिल नहीं करेंगे।

वरिष्ठ फ़ौजियों में तीन नाम ऊपर

जनरल अशफ़ाक परवेज़ कायानी इस वक्त फ़ौज में सबसे वरिष्ठ जनरल हैं। उनके बाद तीन नाम उभरकर सामने आ रहे हैं। इनमें जनरल हारुन असलम, जनरल राशिद और जनरल राहील शरीफ के नाम शामिल हैं। मगर आर्मी चीफ के अलावा ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ़ कमेटी की पोस्ट भी खाली है।

माना जा रहा है कि जनरल असलम को यह पद दिया जा सकता है। बाक़ी दो में से नवाज़ शरीफ़ को एक को सेना प्रमुख का चुनाव करना होगा। सामरिक विशेषज्ञों का कहना है कि जनरल राहील इसमें ज़्यादा सही उम्मीदवार हो सकते हैं।

मगर पाकिस्तान फ़ौज के अहम लोगों में तजुर्बा ज़्यादा अहमियत रखेगा। पहले देखा गया है कि आईएसआई प्रमुख ही इस पद पर बैठते थे। इसकी वजह थी कि वो देश के अंदरूनी हालात के अलावा सीमाओं पर नज़र भी रखते हैं।

मगर इस बार शायद नवाज़ शरीफ़ इस बात का ख़्याल रखेंगे कि वह ऐसे सेना प्रमुख को चुनें जिन्होंने कश्मीर सीमा के अलावा अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर भी काम किया हो।
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