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‘मेरी बच्ची कहती है, अम्मा मैं भी जैनब हूं’

Mon, 15 Jan 2018 05:19 PM IST
बीबीसी
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अम्मा यह टीवी पर बार-बार मेरा नाम क्यों आ रहा है। "मैं भी तो जैनब हूं।" टीवी पर सरसरी-सी नजर डालते हुए मेरी साढ़े तीन साल की बेटी ने मुझसे जब ये सवाल किया तो मेरे पास कहने को कुछ न था, सिर्फ प्यार से उसे गले लगाया और भरी आंखों से जब मुहब्बत और हसरत से उसकी ओर देखा तो एक और सवाल मेरा इंतजार कर रहा था।

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"अम्मा रो क्यों रही हैं?"
एक बार फिर जब कोई जवाब न मिला तो सिर्फ यही कहा कि "जैनब मैं आपके बगैर नहीं रह सकती।" अगर आप पत्रकार भी हैं तो आप घर पर भी खबरों से दूर नहीं रह सकते हैं, उस दिन न्यूज चैनल कसूर में मासूम बच्ची के साथ बलात्कार के बाद कत्ल और पैदा हुए तनाव को दिखा रहे थे। लोगों में दुख और बेबसी ने उन्हें उग्र कर दिया था।

बाबा बुल्ले शाह के कसूर को आखिर किसकी नजर लग गई?
कसूर ही में बार-बार बच्चे क्यों निशाना बन रहे हैं? पुलिस कहां है? यही सोच रही थी कि मेरी बेटी ने आकर मुझसे बात की और जैनब के बारे में पूछा। मैं एक पेशेवर पत्रकार हूं कभी कोई बम धमाका, कभी कोई और त्रासदी, इन घटनाओं की रिपोर्टिंग के बाद किसी हद तक तो ये कह सकती हूं कि मेरी मानसिक स्थिति मजबूत है लेकिन पाकिस्तान के शहर कसूर में एक मासूम बच्ची के साथ बलात्कार के बाद मौत के घाट उतार देना, सिर्फ एक खबर नहीं है जिसकी बस रिपोर्ट हुई और खत्म हो गई।
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एक पत्रकार के साथ-साथ मैं एक मां भी तो हूं, मेरी बच्ची भी बड़ी हो रही है उसे भी बाहर समाज में लोगों का सामना करना है, आगे बढ़ना है, अपना बचाव करना है। कसूर की घटना ने मुझे अंदर से हिलाकर रख दिया है, चिंता और डर दिमाग पर ऐसे हावी हैं कि पीछा ही नहीं छोड़ रही।

'चीखकर रोना चाहती हूं'
कसूर की जैनब का मासूम और मुस्कुराता चेहरा आंखों से ओझल नहीं हो रहा है। मैं चीखकर रोना चाहती हूं। फरियाद करना चाहती हूं, कहते हैं जुल्म हद से बढ़ता है तो प्रलय आता है ये सब क्या है? इस देश में छह महीने के दौरान सात से अधिक बच्चे बलात्कार का शिकार हुए हैं। किसी ने कभी सोचा कि उन पर क्या गुजर रही होगी, उनके मां-बाप, बहन-भाई किस दर्द से पीड़ित होंगे। यौन हमले का शिकार हुए बच्चों का आत्मविश्वास कैसे बहाल किया जाए कि वह अपनी परेशानी को भूल जाएं।

मुझे समझ में नहीं आता कि जैनब के लिए माफी की दुआएं क्यों की जा रही हैं? उसने कौन से गुनाह किए थे, वो तो मासूम थी। उसे क्या हमारी दुआ की जरूरत है? नहीं हरगिज, नहीं उसे हमारी दुआ की जरूरत नहीं है। जैनब का मुस्कुराता चेहरा सवाल कर रहा है कि मेरा कसूर क्या है? इतनी घटनाएं हुईं लेकिन कोई पकड़ा क्यों नहीं गया? जैनब की मां और मुझ जैसी मांएं तो ये चाहती हैं कि कब क्रूर हत्यारा पकड़ा जाए तो हमें भी कुछ तसल्ली हो, कुछ सुकून मिले जख्म तो बहुत गहरा, भरते-भरते वक्त लगेगा।

मैं इस बारे में नहीं सोचना चाहती हूं कि हमारे समाज में ऐसे लोग क्यों हैं, क्योंकि दरिंदगी बढ़ गई है। इंसानियत खत्म होती जा रही है। मैं तो बस ये चाहती हूं कि बच्चे मासूम हैं, उन्हें हमको बचाना है, हम सबको मिलकर उनका भविष्य संवारना है।

बच्चों को सुरक्षित रखना हो प्राथमिकता
बच्चों के साथ बुरे व्यवहार की घटनाएं अमरीका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में भी होती हैं लेकिन दोषियों को पकड़ने के बाद सजा मिलने से उन घटनाओं के बारे में लोगों को अधिक पता चलता है। वहीं, यहां बच्चों के साथ ज्यादती के इतने केस रिपोर्ट होने के बाद अब तक कानूनी एजेंसियां क्या कर रही हैं? क्या इन बच्चों को महफूज करना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है?

उस दिन से अबतक गाहे-बगाहे ही अपनी बेटी को पास बुलाकर गोद में बैठा लेती हूं और यही समझाती हूं कि "जैनब मेरी किसी अजनबी के पास न जाना, कोई आपकी बात गौर से सुने गैर-जरूरी छू नहीं सकता, कोई बात हो आकर अम्मा को बतानी है। बेटा किसी से डरना नहीं है तुम बहुत बहादुर हो।" शायद ये मेरे अंदर का खौफ है या शर्मिंदगी जिसका हल मैं अपनी बेटी से बात करके कर रही हूं। कसूर की जैनब तुम तो बेगुनाह ही मारी गई हो, अभी तो तुमने बहुत सी बहारें देखनी थी, तुम कैसे ही बिन खिला मुरझा गईं। मैं तुम से बहुत शर्मिंदा हूं मुझे माफ कर देना। बस इसके बाद फैज अहमद फैज की ये नज्म याद आती है।
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आज के नाम और आज के गम के नाम,
आज का गम के है जिंदगी के भरे गुलसितां से खफा,
जर्द पत्तों का बन जर्द पत्तों का बन जो मेरा देस है।

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