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‘कड़वे सवालों का जवाब दे पाकिस्तान की सेना’

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पाकिस्तान में सेना जो मांगती है सरकार उसे वो मुहैया करवाती है। सरकार ने सेना के नियंत्रण में सैन्य अदालत से लेकर विदेश नीति तक सब कुछ दे रखा है, लेकिन इसका नतीजा केवल दिखावा है।
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पेशावर में सैनिक स्कूल पर हमले की पहली बरसी के कुछ ही दिनों बाद हुए इस हमले से कई सवाल उठते हैं। सेना की ओर से आतंकियों को बुरी तरह तबाह करने और सफलता का ढोल पीटने के बीच एक माह के भीतर खैबरपख्तूनख्वा में यह तीसरा बड़ा हमला है। इन हमले के बाद क्या होगा।

यही न कि एसीपी बुलाई जाएगी, एक संयुक्त टीम बनाई जाएगी और इसके बाद घोषणा की जाएगी कि दोषियों को जरूर सजा दिलाई जाएगी।

पेशावर हमले के बाद आतंकियों के सफाये की बात कही गई थी लेकिन एक साल से अधिक समय बाद यह रणनीति पूरी तरह विफल दिखती है। प्रतिबंधित संगठन खुलेआम घूम रहे हैं।
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सरकार उन पर प्रतिबंध लगाती है लेकिन वे नाम बदलकर फिर उभर जाते हैं। वे चुनाव लड़ते हैं और जीत भी हासिल करते हैं। वर्ष 2002 में लश्कर-ए-ताइबा पर प्रतिबंध लगाया गया लेकिन उसने अपना नाम जमात-उल-दावा रख लिया और आज भी वह सरकार के नाक के नीचे काम कर रहा है।

आपात स्थिति में वह सेना के साथ काम करता है। पठानकोट हमला मामले में पाकिस्तान ने प्रतिबंधित जैश-ए-मोहम्मद के खिलाफ कार्रवाई की घोषणा की।

उसके दफ्तरों को बंद करने के साथ उसके सरगनाओं को ऐहतियातन हिरासत में लिया गया। लेकिन सवाल उठता है कि 2002 में प्रतिबंध लगाए जाने के 14 साल बाद सरकार उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए अब क्यों जागी।
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सरकार का रटा-राटाया बयान

हर हमले की तरह इस हमले के बाद भी सरकार की ओर से रटा-राटाया बयान आया। ये मुसलमान नहीं हैं। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। यह रॉ का षड्यंत्र है... आदि।

ऐसे सतही बयान पाकिस्तान में उपदेश के हिस्सा बन गए हैं। हमला हुए एक घंटा भी नहीं हुआ था कि मीडिया इस मामले में भारत की ओर उंगली उठाने लगा।

आतंकी मुसलमान नहीं हो सकते जैसे सतही बयान देने से कोई असर नहीं पड़ने वाला है। यह ऐसा समय है जब हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि वे मुसलमान हैं और वे इस्लाम के मुताबिक ऐसे हमले करने का दावा करते हैं। अगर ये मुसलमान नहीं हैं तो क्यों हकीमुल्लाह मेहसूद, बैतुल्लाह मेहसूद और ओसामा बिल लादेन को शहीद और इस्लाम का सिपाही करार दिया गया।

हजारों लोग उनके जनाजे की नमाज में क्यों शामिल हुए। यह समय पाकिस्तानी सेना से कुछ कड़वे सवाल पूछने का है। आज सेना के नियंत्रण में हर चीज है, लेकिन फोटो खिंचवाने के अलावा उनके तरफ से क्या नतीजे मिले।

अंत में मारे गए बच्चों को साहसी, हीरो, हिम्मती जैसे शब्दों से अलंकृत करना बंद करें, वे बहादुर नहीं थे... वे केवल छात्र थे। आतंकियों ने उनकी जघन्य हत्या की। इसमें गर्व करने जैसी बात नहीं थी, वे असहाय थे। ...

(द नेशन अखबार से साभार)
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