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गुमनामी की जिंदगी जीता रहा रमजान कबाड़ी, मौत के बाद पता चली उसकी असलियत

Wed, 16 Aug 2017 10:34 AM IST
बीबीसी, हिन्दी
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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रमजान कबाड़ी कुछ दिन पहले अपनी दुकान पर बिछी चारपाई पर लेटे-लेटे मर गया। अपने पीछे वह बहुत सा काठ-कबाड़, काले शर्बत की चार शीशियां, एस्पिरिन की कुछ गोलियां, ज़ख्मों पर बांधने वाली पट्टियों के चार बंडल, एक तालाबंद संदूकची और एक बेटी छोड़ गया।
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इस बेटी की पूरी जिंदगी दुकान के साथ लगी कुटिया के अंदर-बाहर गुजर गई। इस बेटी का असल नाम कोई नहीं जानता। गूंगी का नाम भला कौन जानेगा? मां को किसी ने देखा नहीं था। रमजान कबाड़ी भी हमेशा उसे बिटिया कहके पुकारता था। मोहल्लेवालों ने अपनी आसानी के लिए उसका एक नाम रख दिया था- रमजानो, रमजान की रमजानो।

रमजानो बच्ची से बड़ी हुई और फिर बुढ़ापे में दाखिल हो गई। मगर रमजान कबाड़ी की क्या उम्र थी?

तीन दिन पहले जब वह मरा तो मोहल्ले के बुजुर्गों ने उसकी दाढ़ी के सफेद बालों, भौहों की सफेदी, चेहरे और हाथों की झुर्रियों से अंदाजा लगाया कि बड़े मियां 80 साल से तो ज्यादा के ही थे। दफनाने के बाद मोहल्ले की मस्जिद कमेटी के चार-पांच बुजुर्ग सिर जोड़कर बैठे ताकि यह फैसला हो सके कि रमजान कबाड़ी की दुकान और सामान का क्या करना है। क्या इसे बेचकर इसके पैसे रमजानो को दे दें या फिर किराये पर चढ़ा दें ताकि रमजानो का गुजारा चलता रहे।
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रमजान कबाड़ी की संदूकची में ये सब कागज किसके थे और क्यों थे?

प्रतीकात्मक तस्वीर
मगर इससे भी अहम सवाल यह था कि यह मालूम तो हो कि यह दुकान किसकी मिल्कियत है और इसके कागजात कहां हैं। ये बुजुर्ग रमजानो के पास गए, उसे ओढ़नी ओढ़ाई और कुछ सवालात किए। गूंगी समझी या न समझी मगर उसने दुकान में बिछाई चारपाई के नीचे से तालाबंद संदूकची निकालकर बुजुर्गों के आगे रख दी।

ताला तोड़ दिया गया। इसमें कुछ तुड़े-मुड़े कागजात और कुछ ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें थीं। गोरखपुर के किसी स्कूल का स्पोर्ट्स में हिस्सा लेने का तारीखी सर्टिफिकेट भी मिला, जिसपर रमजान अली खान वल्द मुमताज अली खान लिखा हुआ था। तारीख थी- 1936।

एक 15-16 साल के बच्चे की कोट-टाई वाली ब्लैक एंड व्हाइट पीली सी तस्वीर मिली। एक तस्वीर में जिन्ना साहब से कोई नौजवान बातें करता दिख रहा था।
एक लेटर जो इवेक्यू प्रॉपर्टी ट्रस्ट कराची के एडमिनिस्ट्रेटर के दफ्तर से 16 अक्टूबर 1947 को जारी हुआ, जिसमें किसी मोहनलाल वासवानी के घर की रमजान अली खान वल्द मुमताज अली खान के नाम अलॉटमेंट की गई थी।

मगर रमजान कबाड़ी की संदूकची में ये सब कागज किसके थे और क्यों थे?

अचानक मस्जिद कमेटी के एक बुजुर्ग की आंखें चमक उठीं। 'यार ये साला तो बहुत चालाक निकला। हमें जिंदगी भर कबाड़ी होने के धोखे में रखा। चलो इसकी कब्र पर फूल चढ़ाकर आएं। अरे एक तख्ती भी तो बनवानी होगी संगमरर की, कब्र पर लगाने के लिए। रमजान अली खान वल्द मुमताज अली खान, तहरीक-ए-आजादी के अजीम रहनुमा।
और फिर सब गूंगी रमजानो को इस काठो-कबाड़ में छोड़कर कब्रिस्तान की ओर तेज-तेज कदमों से चलने लगे।
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