क्या नवाज़ शरीफ़ की कुर्सी जाने से भारत की चिंताएं बढ़ेंगी। ये सवाल लोगों के ज़ेहन में आना स्वाभाविक है लेकिन ये भी सवाल पूछना ज़रूरी है कि उनके पद पर रहते दोनों देशों के बीच हालात कैसे रहे हैं। नवाज़ शरीफ़ तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं लेकिन भारत के साथ संबंध में कभी कोई उत्साह शायद ही नज़र आया हो।
पूर्व राजनयिक राजीव डोगरा के अनुसार प्रधानमंत्री कोई हो पाकिस्तान में सेना की ही चलती है। "बुनियादी बात ये है कि इस्टैब्लिशमेंट जो रही है पाकिस्तान की, इस्टैब्लिशमेंट का मतलब सेना से, वो कंट्रोलिंग सीट पर 1947 से है और वो आगे भी रहेगी चाहे प्रधानमंत्री कोई हो।"
विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान मामलों के जानकार और पूर्व राजनयिक विवेक काटजू कहते हैं पाकिस्तान की सेना ही असल पावर रखती है। "हम अपने आपको तसल्ली दे सकते हैं कि भारत की पाकिस्तान की सिविलियन नेताओं से बातचीत हो रही है और सिविलियन नेता चाहता है कि रिश्तों में सुधार हो। लेकिन ये तसल्ली एक झूठी तसल्ली होगी क्योंकि पाकिस्तान की सेना भारत को एक स्थायी दुश्मन समझती है।"
यूँ तो भारत की तरजीह लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित नेताओं से बातचीत करने की रही है लेकिन पिछले 70 सालों में पाकिस्तान में चार सेना जनरल सत्ता में रहे हैं -- अयूब ख़ान, याह्या ख़ान, ज़िया उल हक़ और परवेज़ मुशर्रफ। भारत को इन चारों से बात करना इसकी मजबूरी रही है।
अब धारणा ये बन रही थी कि पाकिस्तान सैन्य तख्तापलट का दौर ख़त्म हुआ और लोकतंत्र मज़बूत हुआ है। नवाज़ शरीफ़ तीसरी बार प्रधानमंत्री बने तो लगा अब उनकी पकड़ मज़बूत हुई है। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार भारत की पाकिस्तान से दोस्ती के हर बार क़दम बढ़ाने से एहसास हुआ कि "असल सत्ता सेना के पास है।"
विवेक काटजू कहते हैं कि इसके बावजूद नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने पाकिस्तान की तरफ़ काफी लचक दिखाई और नवाज़ शरीफ से दोस्ती का कई बार हाथ बढ़ाया। पहले मई 2014 में अपने शपथ ग्रहण के समय उन्हें दिल्ली बुलाया। इसके बाद जुलाई 2015 में दोनों नेता जब विदेश में एक बार मिले तो औपचारिक रूप से बातचीत दोबारा शुरू करने का फ़ैसला हुआ।