इस फैसले ने देश की सेना को नाराज कर दिया था। यह पहली बार था जब पाकिस्तान में किसी पूर्व शीर्ष सैन्य अधिकारी को देशद्रोह के लिए इस तरह की सजा का सामना करना पड़ा था। बाद में लाहौर उच्च न्यायालय ने मौत की सजा को रद्द कर दिया था। सेना ने 75 वर्षों से अधिक समय तक की अवधि के लिए पाकिस्तान में शासन किया है।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेपी) काजी फैज ईसा, न्यायमूर्ति सैयद मंसूर अली शाह, न्यायमूर्ति अमीनुद्दीन खान और न्यायमूर्ति अतहर मिनाल्लाह की चार सदस्यीय पीठ विशेष अदालत द्वारा मुशर्रफ को सुनाई गई मौत की सजा को पलटने की मांग वाली अपीलों पर सुनवाई करेगी। मुशर्रफ ने अपने वकील सलमान सफदर के जरिए दोषसिद्धि को रद्द करने के लिए अपील दायर की थी क्योंकि मुकदमा संविधान के साथ-साथ आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) 1898 के उल्लंघन के लिए चलाया गया था और पूरा किया गया था।
स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, अपील में कहा गया है कि पूर्व राष्ट्रपति पर पूरी तरह असंवैधानिक तरीके से संवैधानिक अपराध का मुकदमा चलाया गया। याचिका में कहा गया है कि मुशर्रफ पाकिस्तानी सेना के पूर्व चार सितारा जनरल हैं और उनका करियर उल्लेखनीय रूप से प्रतिष्ठित रहा है। एक अन्य घटनाक्रम में सिंध उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन ने विशेष अदालत के फैसले को असंवैधानिक घोषित करने के लाहौर उच्च न्यायालय के जनवरी 2020 के फैसले को भी चुनौती दी थी और उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द करने की मांग की थी।
याचिका में शीर्ष अदालत से संविधान को नष्ट करने के लिए विशेष अदालत द्वारा दी गई सजा को बहाल करने का भी अनुरोध किया गया था। वकील रशीद ए. रजवी द्वारा दायर अपील में कहा गया था कि उच्च न्यायालय का फैसला पूरी तरह से अवैधता, तथ्यों की गलत समझ, कानून की अनदेखी से ग्रस्त है और इसलिए शीर्ष अदालत इसे निरस्त कर सकती है।