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पाकिस्तान: इमरान की चीन और बाजवा की अमेरिका से मोहब्बत में पिस रहा मुल्क! जानें इसके क्या मायने?

आशीष तिवारी
Updated Sun, 03 Apr 2022 06:02 PM IST

सार

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और आर्मी चीफ कमर जावेद बाजवा के बीच अलग-अलग मुल्कों के प्रति बढ़ रही मोहब्बत ही पाकिस्तान के राजनैतिक घटनाक्रम का बड़ा आधार है। 
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पाक प्रधानमंत्री इमरान खान और सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा - फोटो : social media


अमेरिका ने जब चाहा पाकिस्तानी शासन को कमजोर कर दिया

रक्षा मामलों से जुड़े जानकार, लेफ्टिनेंट कर्नल बीएस साहा बताते हैं कि पाकिस्तान के हुक्मरानों को इस बात का बखूबी अंदाजा है कि अमेरिका की सहमति से ही वह लोग यहां पर शासन करते आए हैं। साहा कहते हैं कि अमेरिका ने जब चाहा तो वहां पर पाकिस्तानी शासक को न सिर्फ कमजोर कर दिया बल्कि उसके समानांतर एक दूसरी सत्ता खड़ी करके उसके हाथ में पाकिस्तान की सत्ता तक पहुंचने की पूरी रणनीति बनाई। वो कहते हैं पाकिस्तान की राजनीति को करीब से समझने वाले लोग जानते हैं कि वहां की राजनीति भ्रष्टाचार और सत्ता लोलुपता शुरुआत से ही चरम पर रही है। इसके लिए पाकिस्तान के नेता और सेना हमेशा से पश्चिमी देशों के चरणों में रहती थी।


वह कहते हैं कि जनरल अयूब खान से लेकर जनरल जिया उल हक और जनरल परवेज मुशर्रफ से लेकर नवाज शरीफ तक को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने ममें अमेरिका का योगदान रहा है। सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे इन सभी नेताओं ने किसी न किसी तरीके से तख्तापलट करके ही पाकिस्तान में सत्ता चलाई। पाकिस्तान के एक वरिष्ठ पत्रकार भी इस बात को मानते हैं कि पाकिस्तान में जिस तरीके से अमेरिका या कुछ अन्य पश्चिमी देशों का हस्तक्षेप है उससे यहां पर अस्थिरता बनी हुई है।


दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और विदेशी मामलों के जानकार प्रोफेसर अभिषेक सिंह कहते हैं कि दरअसल यूक्रेन युद्ध के दौरान इमरान की रूस यात्रा ही उनके संकट का सबसे बड़ा कारण है। प्रोफेसर अभिषेक कहते हैं कि 2008 के बाद से जब पूरी दुनिया में आर्थिक रूप से अस्थिरता बढ़ी तो पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्ते में भी दरारें पड़ने शुरू हो गई। उधर पाकिस्तान की नई दोस्ती चीन के साथ ज्यादा बढ़ने लगी। 2008 के बाद पाकिस्तान में कई बार बड़ी राजनीतिक उठापटक हुई। इसके पीछे सबसे बड़ी यही वजह थी कि पाकिस्तानी सैनिकों और पाकिस्तान के बड़े नेताओं का निवेश अमेरिका समेत कई पश्चिमी देशों में था। वैसे तो पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का झुकाव अमेरिका की ओर ही था। क्योंकि उनके बड़े कारोबार यूरोप और अमेरिका में ही थे। लेकिन एक वक्त के बाद उनके रिश्ते चीन से मजबूत होने लगे। ऐसे दौर में पाकिस्तान में फिर राजनीतिक उठापटक शुरू हुई और नवाज शरीफ की विदाई हो गई। रक्षा मामले के विशेषज्ञ विदेशी मामलों के जानकार मानते हैं कि अमेरिका की वजह से ही ऐसे हालात हुए। इमरान खान के मामले में भी कमोबेश यही हालात और स्थितियां परिस्थितियां बनी जो पूर्व प्रधानमंत्रियों के समय रहती थी, मतलब सेना से टकराव हुआ और सत्ता से हाथ धोना पड़ा।


प्रोफेसर अभिषेक बताते हैं कि इमरान का रूस के साथ दोस्ताना व्यवहार होना। यूक्रेन युद्ध से पहले रूस और चीन की प्रगाढ़ता बढ़ना। पाकिस्तान में चीन का सबसे ज्यादा निवेश करना और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान का युद्ध से पहले रोजाना। इन सब को अगर आप एक सीक्वेंस में देखेंगे तो आपको पाकिस्तान में हुए राजनैतिक खेल का असली मतलब समझ में आ जाएगा। प्रोफेसर अभिषेक कहते हैं कि पाकिस्तान में भी राजनीतिक घटनाक्रम को सिर्फ पाकिस्तान के नजरिए से ही जोड़कर नहीं देखना चाहिए बल्कि उसका असर पूरे साउथ एशिया और एशिया पर पड़ना ही पड़ना है। 


अभिषेक कहते हैं, क्योंकि चीन ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अच्छा खासा निवेश किया है, इसलिए चीन की भी यही पसंद है कि उसके मन की सरकार वहां पर रहे। इसके अलावा पाकिस्तान और चीन दोनों मिलकर साउथ एशिया में अलग-अलग माध्यम से अस्थिरता लाने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तान जहां पड़ोसी मुल्कों में प्रायोजित आतंकवाद को बढ़ावा देने की कोशिश करता है वही चीन डिप्लोमेटेकली पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अपना निवेश अपने हित को साथ रहा है। साउथ एशिया के दक्षिण के महासागरों में चीन का सीधा दखल हो सके और वह वहां से दुनिया के बड़े हिस्से पर अपनी धाक जमाने की कोशिश करें। 

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