पाकिस्तान को अगर दिवालिया होने से बचना है तो एफएटीएफ की हर शर्त पूरी करनी होगी। आतंकियों पर सख्त और निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई तो काली सूची में जाने का खतरा पूरा है। ऐसे में अब दाऊद इब्राहिम पर भी फैसला करना ही होगा क्योंकि, इमरान सरकार मान चुकी है कि वह कराची में है। पाकिस्तान सरकार और सेना के बीच दाऊद को लेकर विवाद रहा है।
ब्रिटेन में रह रहे पाकिस्तानी लेखक और पत्रकार डॉक्टर अमजद अयूब मिर्जा ने एक लेख में कहा, 1980 की शुरुआत में ही पाकिस्तानी सेना ने ड्रग तस्करी को कमाई का जरिया बनाया। सेना दाऊद के नेटवर्क के जरिये इसकी अंतरराष्ट्रीय रूप से सप्लाई करती और करोड़ों डॉलर में कमाई होती। सेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल फजल हक को खैबर पख्तून्ख्वा का गवर्नर इसलिए ही बनाया गया ताकि तस्करी में दिक्कत न हो। इस कमाई का एक हिस्सा आतंकी तैयार करने और मदरसे बनाने पर खर्च हुआ।
इस बीच मुंबई पुलिस ने दाऊद के नेटवर्क को करीब-करीब खत्म कर दिया। 2003 में उसे वैश्विक आतंकी घोषित किया गया। वहीं अब ड्रग्स का काम अब लगभग खत्म हो चुका है। ऐसे में पाकिस्तान की सरकार और सेना के पास कोई रास्ता नहीं बचा है। अगर दाऊद पर कार्रवाई होगी तो इसके सबूत देने होंगे।
यासीन मलिक, गिलानी को भी मिला हिस्सा
ड्रग्स की कमाई का एक बड़ा हिस्सा कश्मीर के अलगाववादी नेताओं के पास भी पहुंचता था। इनमें यासीन मलिक, अली शाह गिलानी और कई अन्य भी थे। कश्मीर में हिंसा की आड़ लेकर तस्करी की जाती थी।