शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) सरकार के पांव के नीचे की जमीन कमजोर हो गई है। बीते हफ्ते पंजाब प्रांत मे सरकार गठन से संबंधित घटनाओं ने इस सरकार की साख और रुतबे को दोनों को बुरी तरह प्रभावित किया है। इससे देश में राजनीतिक अस्थिरता का संकट और गहरा गया है।
विश्लेषकों की राय है कि पीडीएम और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के बीच जारी टकराव से राजकाज ठप होता दिख रहा है। ये हालत उस समय पैदा हुई है, जब देश में आर्थिक संकट रोज बदतर हो रहा है। लोग महंगाई से परेशान हैं।
ताजा टकराव बीते 22 जुलाई को खड़ा हुआ। उस रोज पंजाब प्रांत की असेंबली में नया मुख्यमंत्री चुनने के लिए मतदान हुआ। उसके कुछ ही दिन पहले असेंबली के लिए हुए उपचुनाव नतीजे सामने आए थे, जिसमें पीटीआई को भारी जीत मिली थी। इससे पंजाब प्रांत की असेंबली में पीटीआई के नेतृत्व वाले गठबंधन को बहुमत हासिल हो गया था।
असेंबली में मतदान के दौरान पीटीआई समर्थित उम्मीदवार परवेज इलाही को 186 वोट मिले। पीडीएम के उम्मीदवार हमजा शरीफ को 176 वोट ही मिले, लेकिन डिप्टी स्पीकर ने इलाही को मिले दस वोट रद्द कर दिए। उन्होंने शहबाज शरीफ के बेटे हमजा शरीफ को विजयी घोषित कर दिया। बाद में बीते मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने डिप्टी स्पीकर के फैसले को रद्द करते हुए इलाही को मुख्यमंत्री नियुक्त करने का आदेश दिया।
सत्ता संभालने के बाद नई पंजाब सरकार ने संघीय गृह मंत्री राना सनाउल्लाह के पंजाब में प्रवेश पर रोक लगाने का एलान किया। उस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए सनाउल्लाह ने कहा कि अगर पंजाब सरकार ने इस रोक पर अमल किया, तो राज्य में गवर्नर का शासन लागू कर दिया जाएगा।
पाकिस्तान राजनीति के जानकार शहजादा जुल्फिकार ने कहा है कि पंजाब और संघीय सरकारों के बीच टकराव का बेहद गंभीर परिणाम होगा। उन्होंने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से कहा- ‘अगर ये टकराव इसी तरह जारी रहा, तो उससे पूरी अफरातफरी फैल जाएगी। उसका खराब असर दोनों सरकारों की साख पर पड़ेगा।’
पर्यवेक्षकों के मुताबिक बीते मंगलवार को आए फैसले के बाद संघीय सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच भी टकराव खड़ा हो गया है। इस्लामाबाद स्थित राजनीतिक विश्लेषक अदनान रहमत ने कहा है- ‘कोर्ट में इस मामले में सत्ताधारी गठबंधन की हार से सरकार और सर्वोच्च न्यायपालिका में गहरा अविश्वास पैदा हो गया है।’ हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि सत्ताधारी गठबंधन ने कानून पारित कर प्रधान न्यायाधीश के अपनी पहल पर मामलों की सुनवाई करने के अधिकार को नियंत्रित करने का इरादा जता दिया है।
जानकारों की राय है कि राजनीतिक टकराव और अस्थिरता के कारण आर्थिक संकट से निपटने के सरकार के प्रयास प्रभावित होंगे। उससे संकट और गहराएगा। इस्लामाबाद स्थित एनयूएमएल यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंध विषय के प्रोफेसर ताहिर मलिक ने कहा है- ‘देश में आर्थिक आपातकाल की स्थिति होने के बाद सरकार ने समाधान निकालने के लिए कोई स्पष्ट दिशा अपनाने में नाकाम रही है। सरकार ने अब तक सिर्फ आईएमएफ के पास जाने का फैसला किया है, लेकिन आईएमएफ का कर्ज पर्याप्त साबित नहीं होगा।’