पाकिस्तान में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ सरकार का हर दांव उलटा पड़ रहा है। एक तरफ इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के चुनाव पर लगाई गई रोक पर अमल फिलहाल रोक दिया है, वहीं सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के सवाल पर सरकार के अंदर फूट पड़ गई है। इस विवाद में कानून मंत्री ने इस्तीफा दे दिया है। इस बीच इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) इस्लामाबाद तक मार्च आयोजित करने की अपनी तैयारियों में जुटी हुई है।
इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने सोमवार को साफ कर दिया कि निर्वाचन आयोग की तरफ से इमरान खान को पांच साल के लिए चुनाव लड़ने से रोकने का फैसला अभी अमल में नहीं आएगा। इसलिए 30 अक्तूबर को होने वाले एक उप चुनाव में खान बतौर उम्मीदवार हिस्सा ले सकेंगे। बीते शुक्रवार को निर्वाचन आयोग ने तोशाखाना मामले में इमरान खान को दोषी ठहराते हुए उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगाई थी। इस मामले में आरोप है कि प्रधानमंत्री रहते हुए इमरान खान को जो उपहार दूसरे देशों से मिले, उन्हें उन्होंने पाकिस्तान के कानून के मुताबिक सरकारी खजाने में जमा नही कराए।
हाई कोर्ट ने कहा है कि आयोग के फैसले पर हाई कोर्ट जब तक किसी निर्णय पर नहीं पहुंचता, तब तक इमरान खान के चुनाव लड़ने पर रोक नही है। आयोग ने अपने फैसले का ब्योरा सोमवार को जारी किया। कोर्ट इसके अपने अपना निर्देश जारी कर चुका था। कोर्ट ने कहा कि वह आयोग के निर्णय की बारीकी से समीक्षा करने के बाद ये तय करेगा कि आयोग का फैसला कानून सम्मत है या नहीं।
इस बीच कानून मंत्री आजम नजीर तरार के इस्तीफे से शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) सरकार को तगड़ा झटका लगा है। बताया जाता है कि पाकिस्तान के प्रधान न्यायाधीश उमर अता बंदियाल ने दो जूनियर जजों को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त करने की सिफारिश की। तरार जस्टिस बंदियाल की सिफारिश का समर्थन कर रहे थे। इस मुद्दे पर सरकार के अंदर मतभेद खड़े हो गए। विवाद बढ़ने पर तरार ने इस्तीफा दे दिया।
इस मुद्दे पर पाकिस्तान की लीगल कम्युनिटी भी सरकार के खिलाफ खड़ी दिखती है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने तरार के फैसले का स्वागत किया है। अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यून में छपी एक खबर के मुताबिक सत्ता पक्ष एक सम्मेलन के दौरान हुई सरकार विरोधी नारेबाजी को लेकर भी तरार से नाराज था। उस सम्मेलन में तरार मौजूद थे, लेकिन आरोप है कि उन्होंने विरोधियों को उचित जवाब नहीं दिया।
इस बीच पाकिस्तान के पत्रकार अरशद शरीफ की केन्या में हुई हत्या के मसले पर भी शहबाज शरीफ सरकार के कठिन प्रश्न पूछे जा रहे हैँ। आरोप है कि 49 वर्षीय अरशद शरीफ गिरफ्तारी से बचने के लिए अगस्त में पाकिस्तान से बाहर चले गए थे। इसी सिलसिले मे वे केन्या गए, जहां पुलिस ने “गलत पहचान” के कारण उन्हें गोली मार दी। अगस्त में सरकार ने अपने कई विरोधी पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की थी। पाकिस्तान में सोशल मीडिया की चर्चाओं में इस हत्या के लिए शरीफ सरकार को जिम्मेदार बताया जा रहा है।