पाकिस्तान में जमीन के बहुत बड़े हिस्से पर कब्जे के कारण सेना को सबसे बड़ा जमींदार कहा जाता है। साथ ही सेना कई तरह की कारोबारी गतिविधियां भी चलाती हैं, जो सैन्य अफसरों की आमदनी का एक बड़ा जरिया है। मारगला हिल्स नेशनल पार्क की जमीन पर भी सेना ने कब्जा कर रखा है। इस कब्जे को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी...
पाकिस्तान में सेना इस समय जिस तरह से खुद को घिरा महसूस कर रही है, वैसा इस देश के 75 साल के इतिहास में कभी नहीं हुआ। राजनीति में उसकी भूमिका को लेकर जारी जन आलोचना के बीच ही अब इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने उसके कारोबारी हितों पर सीधा प्रहार किया है। हाई कोर्ट ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि पाकिस्तान की सेना को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी कारोबारी उद्यम में शामिल होने का अधिकार नहीं है। न ही उसे सरकारी जमीन पर मालिकाना जताने का हक है। ऐसी गतिविधियों में वह तभी शामिल हो सकती है, अगर संघीय सरकार ने इसके लिए अनुमति दी हो।
विज्ञापन
पाकिस्तान में जमीन के बहुत बड़े हिस्से पर कब्जे के कारण सेना को सबसे बड़ा जमींदार कहा जाता है। साथ ही सेना कई तरह की कारोबारी गतिविधियां भी चलाती हैं, जो सैन्य अफसरों की आमदनी का एक बड़ा जरिया है। मारगला हिल्स नेशनल पार्क की जमीन पर भी सेना ने कब्जा कर रखा है। इस कब्जे को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। इस बारे में ही इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने बुधवार को अपना विस्तृत फैसला सुनाया। विश्लेषकों के मुताबिक इस निर्णय से दूसरी जगहों पर की जमीन पर सेना के कब्जे और कारोबारी उद्यम में उसकी भागीदारी भी अवैध हो गई है। इसीलिए इस निर्णय को दूरगामी महत्त्व का बताया जा रहा है।
पर्यवेक्षकों ने कहा है कि सैन्य नेतृत्व के लिए इस फैसले को गले उतारना मुश्किल होगा। इसकी वजह यह है कि इससे सेना अधिकारियों के हितों पर सीधी चोट पहुंचेगी। फिलहाल संभवतया सेना फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। अगर वहां भी उसकी हार हुई, तो उसके बाद उसकी कैसी प्रतिक्रिया होगी, इस बारे में फिलहाल कुछ कहना मुश्किल है। पाकिस्तान के बनने के बाद से ज्यादातर समय तक वहां सैनिक शासन रहा है। उन अवधियों में पाकिस्तान का संविधान और संसद से पारित कानून निलंबित रहे।
विज्ञापन
हाई कोर्ट ने फैसला पाकिस्तान आर्मी एक्ट-1952, एयर फोर्स एक्ट 1953 और पाकिस्तान नेवी ऑर्डिनेंस 1961 को आधार बनाते हुए दिया है। कोर्ट ने कहा कि ये कानून सेना की संबंधित शाखाओं को विनियमित करने और उनमें अनुशासन लाने के मकसद से बनाए गए थे। कोर्ट ने कहा कि पाकिस्तान के संविधान के मुताबिक सेना का प्रमुख दायित्व बाहरी हमले से देश की रक्षा करना है। लेकिन यह काम भी वह संघीय सरकार का निर्देश मिलने के बाद ही कर सकती है। सरकार का निर्देश एक पूर्व शर्त है।
विश्लेषकों के मुताबिक इस निर्णय का मतलब सेना के निर्वाचित सरकार के मातहत होने की पुष्टि करना है। पाकिस्तान में सेना कभी इसे स्वीकार नहीं किया। बल्कि व्यवहार में सरकारें ही उसके मातहत काम करती रहीं। ये आम समझ है कि पाकिस्तान में सत्ता का असली सूत्रधार सेना ही है। सेना के नजरिए से इस फैसले ने ऐसी शुरुआत कर दी है, जिसके तहत सेना की कारोबारी गतिविधियों पर पूरी रोक लग सकती है। क्या सेना इसे चुपचाप मंजूर कर लेगी, यह सवाल अब प्रमुखता से उठ खड़ा हुआ है।