पाकिस्तान सरकार और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के बीच चल रही बातचीत पर पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान का साया मंडरा रहा है। खान ने नए चुनाव की मांग पर जोर डालने के लिए फिर इस्लामाबाद कूच करने का एलान कर रखा है। जबकि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ सरकार की प्राथमिकता इस समय आईएमएफ से 90 करोड़ डॉलर की सहायता जल्द से जल्द हासिल करना है। इसकी वजह यह है कि देश का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से खाली हो रहा है।
दूसरे विशेषज्ञों की भी राय है कि शरीफ सरकार का टिकना सेना के समर्थन और सद्भाव पर ही निर्भर करेगा। इस बीच पर्यवेक्षकों की नजर इमरान खान की अगली चाल पर है। पिछले हफ्ते खान ने नए चुनाव का कार्यक्रम घोषित करने के लिए छह दिन की डेडलाइन देते हुए अपना ‘आजादी मार्च’ अचानक खत्म कर दिया था। कराची स्थित आर्थिक नीति विश्लेषक नदीम हुसैन ने कहा है कि इमरान खान सरकार पर दबाव बनाए रखने पर आमादा हैं। लेकिन पिछले हफ्ते जिस तरह उन्होंने अचानक इस्लामाबाद में अपना धरना खत्म किया, उससे शरीफ सरकार को राहत मिली है।
पाकिस्तान की मौजूदा नेशनल असेंबली का कार्यकाल अगस्त 2023 तक है। जानकारों का अनुमान है कि फिलहाल सेना शरीफ सरकार को समय देगी, ताकि वह आर्थिक मुसीबत से देश को निकाल सके। बीते 20 मई को देश के विदेशी मुद्रा भंडार में सिर्फ दस बिलियन डॉलर बचे थे। जबकि जून के अंत तक विदेशी कर्ज चुकाने के लिए 8.6 बिलियन डॉलर की जरूरत है। इस बीच मदद के नाम पर पाकिस्तान को सिर्फ सऊदी अरब से तीन बिलियन डॉलर की मदद मिली है।
अमेरिकी थिंक टैंक अटलांटिक काउंसिल में पाकिस्तान इनिशिएटिव इकाई के निदेशक उजैर युनूस के मुताबिक अगले 12 से 18 महीनों की अवधि पाकिस्तान के लिए बहुत कठिन है। इसका सामना पीडीएम सरकार को करना होगा। उन्होंने वेबसाइट निक्कई एशिया से कहा- ‘सरकार अगर सब्सिडी घटाएगी तो महंगाई बढ़ेगी और उस कारण सरकार का राजनीतिक समर्थन घटेगा।’
इस्लामाबाद स्थित थिंक टैंक पाकिस्तान हाउस के महानिदेशक मोहम्मद अतहर जावेद की राय है कि अगर इमरान खान ने नए चुनाव पर जोर डालना जारी रखा, तो उसकी भारी कीमत देश को चुकानी होगी। उन्होंने कहा- ‘यह देश के लिए अच्छा नहीं है। इस समय देश को एक ऐसी सरकार की जरूरत है, जो काम करे और जो आईएमएफ से बातचीत चला सकने में सक्षम हो।’