संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) के 43वें सत्र के सम्मेलन में पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके), गिलगित और बाल्टिस्तान को लेकर पाकिस्तान को काफी शर्मसार होना पड़ा। यहां पीओके के लोगों ने न सिर्फ आपबीती सुनाई बल्कि पाक कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान इलाके में किस तरह से स्थानीय लोगों का उत्पीड़न हो रहा है इस बारे में भी विश्व के देशों को जानकारी दी।
बता दें कि पिछले एक सप्ताह से यूएनएचआरसी की बैठक के दौरान दुनिया का ध्यान खींचने के लिए संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के बाहर पाकिस्तान के खिलाफ लगातार प्रदर्शन चल रहे हैं। पूरी दुनिया को बताया जा रहा है कि किस तरह से पाकिस्तान में मानवाधिकारों को धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
गिलगित-बाल्टिस्तान स्टडीज के अध्यक्ष सेंग एच. सेरिंग ने इस बैठक में पीओके के भीतर मानवाधिकारों के उल्लंघन का मुद्दा पुरजोर ढंग से उठाया। उन्होंने कहा कि यहां पर मानवाधिकारों की बात करने पर देशद्रोह और आतंकवाद के मुकदमे चलाए जाते हैं और लोग अत्याचार झेल रहे हैं।
जब यहां के नागरिक अपने प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन रोकने और सांस्कृतिक पहचान को बचाने की मांग करते हैं तो उन्हें उम्रकैद की सजा दे दी जाती है। सेंग सेरिंग ने पख्तूनों की पहचान की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र से तुरंत दखल देने की मांग भी की।
सीपीईसी के तहत हुए कई बदलाव
यूएनएचआरसी के 43वें सत्र में बोलते हुए सेंग एच. सेरिंग ने कहा कि चीन-पाक आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के चलते गिलगित-बाल्टिस्तान में हुए जमीनी बदलाव से बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं। कॉरीडोर के किनारे अवैध कब्जे हुए हैं। यहां पर स्थानीय लोगों को प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल से रोक दिया गया है। इन प्राकृतिक संसाधनों पर अब चीन की कंपनियां हक जता रही हैं।
संवैधानिक रूप से भारत के नागरिक
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में सेंग ने कहा कि गिलगित और बाल्टिस्तान के लोग संवैधानिक तौर पर भारत के नागरिक हैं जो केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के अंतर्गत आते हैं। लेकिन पाकिस्तानी सेना उन पर आतंकी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाकर लगातार उनका उत्पीड़न करती है।