पाकिस्तान की प्रख्यात कार्यकर्ता असमा जहांगीर को मरणोपरांत संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिष्ठित मानवाधिकार पुरस्कार से सम्मानित किया है। जहांगीर पाकिस्तान की सेना की खुलकर आलोचना करती थीं। वह धार्मिक कट्टरपंथ और पाकिस्तान में उत्पीड़न के शिकार अल्पसंख्यकों के अधिकारों की लड़ाई लड़ती थीं। इस साल फरवरी में 66 साल की उम्र में दिल का दौड़ा पड़ने से उनका निधन हो गया था।
उन्हें मरणोपरांत संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार 1968 से हर पांच साल में दिया जाता है। असमा की बेटी मुनीजा जहांगीर ने मंगलवार को एक विशेष समारोह में संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष मारिया फर्नान्डा एस्पिनोजा से यह पुरस्कार ग्रहण किया। असमा जहांगीर के अलावा इस पुरस्कार को पाने वालों में लड़कियों के शिक्षा अधिकारों के लिए काम करने वाली तंजानिया की रेबेका ग्यूमी और ब्राजील के आदिवासी समूह से ताल्लुक रखने वाली पहली महिला वकील जोनिया बाटिस्टा डे कार्वाल्हो व अन्य शामिल हैं।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा कि पुरस्कार से नवाजे गए लोगों के कार्य और दुनिया में मानवाधिकार की रक्षा के लिए काम कर रहे अन्य लोगों के कार्य शांति के लिए बेहद जरूरी हैं। इससे पहले एलेनोर रुजवेल्ट, मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मंडेला, जिम्मी कार्टर, मलाला युसुफजई और इस साल की नोबेल शांति पुरस्कार के विजेता डेनिस मुकवेगे और नादिया मुराद को भी यह प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुका है।
पाकिस्तान में मानवाधिकार आयोग की शुरुआत
1952 में लाहौर में जन्मी असमा ने पाकिस्तान में मानवाधिकार आयोग की सह-संस्थापक होने के साथ ही अध्यक्ष भी थीं। साल 1978 में पंजाब यूनिवर्सिटी से एलएलबी करने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकालत शुरू की।