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अकेलेपन का दर्द: परदेस में भारतीय महिलाओं का सहारा बनी लेडीज कॉर्नर, सुशीला शर्मा हक की अगुवाई

Mon, 26 Oct 2026 10:00 AM IST
ज्योति भास्कर अमर उजाला ब्यूरो, बर्लिन।

सार

अकेलेपन का दर्द बांटने की दिशा में अहम पहल की गई है। सुशीला शर्मा हक की अगुवाई में जर्मनी में अंतरराष्ट्रीय संस्था बनी है। परदेस में भारतीय महिलाओं का सहारा बनी लेडीज कॉर्नर और सुशीला शर्मा हक के बारे में जानिए
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बर्लिन लेडीज कॉर्नर (फाइल) - फोटो : इंस्टाग्राम@susi.frauenzentrum
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विस्तार
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परदेस में अकेलेपन का दर्द समझने वाली चार भारतीय महिलाओं ने 40 साल पहले जो एक संस्था बनाई थी, उसका पूरा सफर अब एक किताब में दर्ज हो चुका है। मुंबई से बर्लिन पहुंचीं सुशीला शर्मा हक की अगुवाई में लेडीज कॉर्नर बर्लिन ने चार दशक पूरे कर लिए हैं।

जर्मनी पहुंचे उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से मुलाकात

इस मौके पर संस्था की सदस्य कविता पाल ने विशेष स्मारिका 40 ग्लोरियस ईयर्स ऑफ लेडीज कॉर्नर बर्लिन तैयार की और इसे केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल को खुद भेंट किया। स्मारिका जर्मनी में भारत के राजदूत अजित गुप्ते को भी सौंपी गई।

पुरुषों की पत्नियों और महिला मित्रों से से संपर्क

सुशीला शर्मा हक ने भारत में टाटा इंस्टीट्यूट से समाजसेवा की पढ़ाई की थी। बर्लिन पहुंचकर उन्होंने देखा कि वहां भारतीय समुदाय की गतिविधियां भारत मजलिस के इर्द-गिर्द सिमटी थीं, जिसे यूरोप की पहली भारतीय संस्था माना जाता है। वहां ज्यादातर पुरुष ही जुटते थे और महिलाओं को केवल तीज त्योहारों पर बुलाया जाता था। सुशीला ने उन पुरुषों की पत्नियों और महिला मित्रों से एक-एक कर संपर्क साधा।

लेडीज कॉर्नर की नींव कैसे रखी गई?

1985 में सुशीला ने सुधा कोठारी, डोरा सैमुएल और छाया सेनगुप्ता के साथ मिलकर लेडीज कॉर्नर की नींव रखी। यहां अब वे धार्मिंक उत्सव, मनोरंजन से लेकर रोजमर्रा की परेशानियों पर  खुलकर चर्चा कर सकती थीं।संस्था का दायरा बढ़ता गया। भारतीय महिलाओं को हर तरह की मदद दी गई और विदेश में भाषा, संस्कृति, त्योहार व संस्कार जीवित रखे गए।

लेडीज कॉर्नर जर्मनी की एक अंतरराष्ट्रीय संस्था से जुड़ी

सुशीला कहती हैं कि चार दशक पूरे कर चुकी संस्था लेडीज कॉर्नर जर्मनी की एक अंतरराष्ट्रीय संस्था का हिस्सा है। कविता पाल ने स्मारिका में इन चार दशक की यादें,  तस्वीरें, प्रेरक कहानियां और उपलब्धियां पिरोई हैं। वह कहती हैं, यह स्मारिका आने वाली पीढ़ियों के लिए एक धरोहर है।

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