नेपाल में सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर दरारें पटने के बजाय चौड़ी हो रही हैं। अब ताजा मामला करनाली की प्रांतीय कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ गहराता असंतोष है। करनाली के मुख्यमंत्री के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर उन्हीं की पार्टी के कई सदस्यों ने दस्तखत किए हैं। अब पार्टी के दोनों गुट एकबार फिर इसे लेकर आमने सामने हैं। पार्टी के सह अध्यक्ष पुष्प कमल दहल प्रचंड ने बीच का रास्ता निकालने के लिए प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली से मुलाकात की है।
गौरतलब है कि पिछले अगस्त में पार्टी के अंदरूनी झगड़ों की वजह से पार्टी के लिए विभाजन का खतरा पैदा हो गया था। उससे केपी शर्मा ओली सरकार संकट में फंस गई थी। तब प्रधानमंत्री ओली के गुट की तरफ से ये इल्जाम लगाया था कि भारत की एजेंसियां उनकी सरकार गिराने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर फूट डाल रही हैं। इससे पार्टी में मौजूद अविश्वास का संकेत माना गया। तब काफी खींचतान के बाद ओली और प्रचंड के गुटों में समझौता हो सका। बताया जाता है कि तब दोनों गुटों के बीच सत्ता की साझेदारी पर रजामंदी हुई। उससे ओली सरकार बच गई। कुछ समय तक पार्टी में शांति रही। लेकिन अब विवाद फिर भड़क गया है।
इसकी वजह से करनाली की प्रांतीय सरकार खतरे में पड़ गई है। नेपाल में कुल सात प्रांत हैं। उनमें से छह में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार है। करनाली भी उन छह प्रांतों में एक है। वहां मुख्यमंत्री महेंद्र बहादुर शाही के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया है। 40 सदस्यीय विधान सभा में वहां 33 सदस्य नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के हैं। जबकि अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन पर 18 सदस्यों ने दस्तखत किए हैं। इनमें 15 सत्ताधारी दल के हैं। जाहिर है, सत्ताधारी दल का एक गुट सरकार गिराने की कोशिश में है। पार्टी प्रवक्ता नारायण काजी श्रेष्ठ ने सोमवार को कहा कि अगर करनाली का संकट हल नहीं हुआ, तो सत्ताधारी पार्टी के लिए बड़ी चुनौतियां पैदा हो जाएंगी।
सोमवार को ही करनाली संकट का समाधान तलाशने की कोशिश में पार्टी के सह अध्यक्ष पुष्प कमल दहल प्रचंड प्रधानमंत्री ओली से मिले। करनाली के मुख्यमंत्री शाही प्रचंड समर्थक माने जाते हैं। वे प्रचंड की पूर्व माओवादी पार्टी के नेता थे। नेपाली मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक ओली और प्रचंड में कोई सहमति नहीं बन सकी। ओली ने अविश्वास प्रस्ताव रोकने की प्रचंड की मांग पर कोई वादा नहीं किया।
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी 2018 में सीपीएन-यूएमएल और माओवादी पार्टी के विलय से अस्तित्व में आई थी। लेकिन विलय के बावजूद पूर्ण एकता कायम नहीं हो पाई है। पार्टी अभी भी यूएमएल और माओवादी खेमों में बंटी हुई है। प्रचंड को शिकायत ये रही है कि उन्हें पार्टी में कोई अहम भूमिका नहीं दी गई है। यूएमएल पार्टी के पूर्व प्रमुख माधव नेपाल भी असंतुष्ट नेताओं में रहे हैं। अब प्रचंड गुट की शिकायत है कि अगस्त में ओली गुट ने जो वायदे किए थे, उन पर अमल नहीं किया गया। केंद्रीय कैबिनेट में फेरबदल कर प्रचंड गुट के सदस्यों को मंत्री नहीं बनाया गया। उलटे करनाली प्रांत मं प्रचंड समर्थक मुख्यमंत्री के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी गई हैं।
जिन छह प्रांतों में कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यमंत्री हैं, उनमें चार ओली समर्थक और करनाली समेत दो प्रचंड समर्थक माने जाते हैं। प्रचंड समर्थक नेताओं का कहना है कि अगर करनाली में सरकार गिरी तो अपनी ही पार्टी की सरकारें गिराने का ट्रेंड कायम हो जाएगा। उसका असर केंद्र पर भी पड़ेगा। लेकिन ओली गुट का कहना है कि करनाली की घटनाओं में प्रधानमंत्री या केंद्रीय पार्टी का कोई हाथ नहीं है।
इस बीच नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के सीनियर नेताओं में बैठकों का दौर जारी है। प्रचंड ने उन नेताओं से कहा है कि करनाली में अविश्वास प्रस्ताव वापस कराने के लिए वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल करें। नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टियों का इतिहास आपसी मतभेद और विभाजनों का रहा है। इस कारण अतीत में उन्होंने सत्ता भी गंवाई है। नेपाल के सियासी हलकों में ये सवाल फिर चर्चित है कि क्या वही इतिहास दोहराया जाएगा? क्या कार्यकाल पूरा करने के पहले ही ओली सरकार सत्ता गंवा देगी?